अध्याय 1 · 29 / 39
1.32-35
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ।
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ॥ ३२ ॥
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ॥ ३3 ॥
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ॥ ३४ ॥
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ॥ ३५ ॥
kim—क्या लाभ; naḥ—हमें; rājyena—राज्य से; govinda—हे श्रीकृष्ण; kim—क्या; bhogaiḥ—भोग से; jīvitena—जीवित रहने से; vā—अथवा; yeṣām—जिनके; arthe—निमित्त; kāṅkṣitam—वांछित; naḥ—हमारे; rājyam—राज्य; bhogāḥ—भौतिक भोग; sukhāni—समस्त सुख; ca—भी; te—वे सब; ime—ये; avasthitāḥ—स्थित; yuddhe—इस युद्धभूमि में; prāṇān—प्राण; tyaktvā—त्यागकर; dhanāni—धन; ca—भी; ācāryāḥ—गुरुजन; pitaraḥ—पितर; putrāḥ—पुत्र; tathā—वैसे ही; eva—निश्चय ही; ca—भी; pitāmahāḥ—पितामह; mātulāḥ—मामा; śvaśurāḥ—श्वसुर; pautrāḥ—पौत्र; śyālāḥ—साले; sambandhinaḥ—सम्बन्धी; tathā—तथा; etān—इन सबको; na—कभी नहीं; hantum—मारने को; icchāmi—मैं इच्छा करता हूँ; ghnataḥ—मारे जाने पर; api—भी; madhusūdana—हे मधु असुर के संहारक (श्रीकृष्ण); api—भले ही; trailokya—तीनों लोकों के; rājyasya—राज्यों के; hetoḥ—बदले में; kim—फिर क्या कहना; nu—केवल; mahī-kṛte—पृथ्वी के लिए; nihatya—मारकर; dhārtarāṣṭrān—धृतराष्ट्र के पुत्रों को; naḥ—हमें; kā—क्या; prītiḥ—प्रसन्नता; syāt—होगी; janārdana—हे समस्त जीवों के पालक।
हे गोविन्द, हमें राज्य, सुख अथवा जीवन से भी क्या लाभ, जब वे सभी, जिनके निमित्त हम इनकी इच्छा करें, इसी युद्धभूमि में सज्जित खड़े हैं? हे मधुसूदन, जब गुरुजन, पितर, पुत्र, पितामह, मामा, श्वसुर, पौत्र, साले तथा समस्त सम्बन्धी अपने प्राण एवं धन त्यागने को तत्पर मेरे सम्मुख खड़े हैं, तब मैं उनका वध करने की इच्छा क्यों करूँ, भले ही मैं जीवित रह जाऊँ? हे समस्त प्राणियों के पालक, मैं तीनों लोकों के बदले में भी इनसे युद्ध करने को तैयार नहीं हूँ, फिर इस पृथ्वी की तो बात ही क्या।
अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण को गोविन्द कहकर सम्बोधित किया है, क्योंकि श्रीकृष्ण गौओं तथा इन्द्रियों के लिए समस्त सुखों के विषय हैं। इस सार्थक शब्द का प्रयोग करके अर्जुन यह संकेत करता है कि किस वस्तु से उसकी इन्द्रियाँ तृप्त होंगी। यद्यपि गोविन्द हमारी इन्द्रियों को तृप्त करने के लिए नहीं हैं, तथापि यदि हम गोविन्द की इन्द्रियों को तृप्त करने का प्रयत्न करें तो स्वतः ही हमारी अपनी इन्द्रियाँ तृप्त हो जाती हैं। भौतिक दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को तृप्त करना चाहता है, और वह चाहता है कि भगवान् ऐसी तृप्ति के लिए आदेश-पालक बन जाएँ। भगवान् जीवों की इन्द्रियों को उतना ही तृप्त करेंगे जितने के वे पात्र हैं, किन्तु उतना नहीं जितने का वे लोभ करें। परन्तु जब कोई विपरीत मार्ग अपनाता है—अर्थात् जब कोई अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने की इच्छा किए बिना गोविन्द की इन्द्रियों को तृप्त करने का प्रयत्न करता है—तब गोविन्द की कृपा से जीव की समस्त इच्छाएँ तृप्त हो जाती हैं। अर्जुन का अपने समुदाय तथा परिवार के सदस्यों के प्रति गहन स्नेह यहाँ अंशतः उनके प्रति उसकी स्वाभाविक करुणा के कारण प्रकट होता है। अतएव वह युद्ध करने को तैयार नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपना ऐश्वर्य मित्रों एवं सम्बन्धियों को दिखाना चाहता है, किन्तु अर्जुन को भय है कि उसके समस्त सम्बन्धी एवं मित्र युद्धभूमि में मारे जाएँगे, और विजय के पश्चात् वह अपना ऐश्वर्य उनके साथ बाँट न सकेगा। यह भौतिक जीवन की एक विशिष्ट गणना है। किन्तु दिव्य जीवन भिन्न है। चूँकि भक्त भगवान् की इच्छाओं को तृप्त करना चाहता है, अतः वह, भगवान् की इच्छा होने पर, भगवान् की सेवा के लिए सभी प्रकार का ऐश्वर्य स्वीकार कर सकता है, और यदि भगवान् की इच्छा न हो तो उसे एक कौड़ी भी स्वीकार नहीं करनी चाहिए। अर्जुन अपने सम्बन्धियों का वध नहीं करना चाहता था, और यदि उनका वध करने की कोई आवश्यकता होती, तो वह चाहता था कि श्रीकृष्ण स्वयं उनका वध करें। इस समय वह यह नहीं जानता था कि श्रीकृष्ण उनके युद्धभूमि में आने से पूर्व ही उनका वध कर चुके थे, और वह तो केवल श्रीकृष्ण का निमित्त मात्र बनने वाला था। यह तथ्य आगे के अध्यायों में प्रकट किया गया है। भगवान् के स्वाभाविक भक्त के रूप में अर्जुन अपने दुष्ट चचेरे भाइयों तथा भाइयों से प्रतिशोध लेना नहीं चाहता था, किन्तु यह भगवान् की योजना थी कि वे सब मारे जाएँ। भगवान् का भक्त अपराधी से प्रतिशोध नहीं लेता, किन्तु भगवान् दुष्टों द्वारा भक्त के प्रति किए गए किसी भी अनिष्ट को सहन नहीं करते। भगवान् अपने प्रति किए गए अपराध के लिए किसी व्यक्ति को क्षमा कर सकते हैं, किन्तु जिसने उनके भक्तों की हानि की हो, उसे वे क्षमा नहीं करते। अतएव भगवान् दुष्टों का वध करने को कृतसंकल्प थे, यद्यपि अर्जुन उन्हें क्षमा करना चाहता था।