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अध्याय 1 · 30 / 39

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पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३६ ॥

pāpam—पाप; eva—निश्चय ही; āśrayet—आश्रय लेना पड़ेगा; asmān—हमें; hatvā—मारकर; etān—इन सबको; ātatāyinaḥ—आततायियों को; tasmāt—अतएव; na—कभी नहीं; arhāḥ—योग्य; vayam—हम; hantum—मारने को; dhārtarāṣṭrān—धृतराष्ट्र के पुत्रों को; svabāndhavān—मित्रों सहित; svajanam—स्वजन; hi—निश्चय ही; katham—कैसे; hatvā—मारकर; sukhinaḥ—सुखी; syāma—हो जाएँ; mādhava—हे श्रीकृष्ण, लक्ष्मी के पति।

यदि हम ऐसे आततायियों का वध करें तो पाप ही हमें आ घेरेगा। अतएव धृतराष्ट्र के पुत्रों तथा अपने मित्रों का वध करना हमारे लिए उचित नहीं है। हे श्रीकृष्ण, हे लक्ष्मीपति, अपने ही स्वजनों का वध करके हम क्या पाएँगे और कैसे सुखी हो सकेंगे?

वैदिक आदेशों के अनुसार छह प्रकार के आततायी होते हैं: 1) विष देने वाला, 2) घर में आग लगाने वाला, 3) घातक शस्त्रों से आक्रमण करने वाला, 4) धन लूटने वाला, 5) दूसरे की भूमि पर अधिकार करने वाला, तथा 6) पर-स्त्री का अपहरण करने वाला। ऐसे आततायी तत्काल वध के योग्य हैं, और ऐसे आततायियों का वध करने से कोई पाप नहीं लगता। आततायियों का ऐसा वध किसी भी सामान्य मनुष्य के लिए सर्वथा उचित है, किन्तु अर्जुन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था। वह स्वभाव से साधु था, अतएव वह उनके साथ साधुता का व्यवहार करना चाहता था। किन्तु इस प्रकार की साधुता क्षत्रिय के लिए नहीं है। यद्यपि राज्य के शासन में उत्तरदायी पुरुष से साधु होने की अपेक्षा की जाती है, तथापि उसे कायर नहीं होना चाहिए। उदाहरणार्थ, भगवान् राम इतने साधु-स्वभाव के थे कि लोग उनके राज्य (राम-राज्य) में रहने के लिए उत्सुक रहते थे, किन्तु भगवान् राम ने कभी कायरता नहीं दिखाई। रावण राम के विरुद्ध एक आततायी था, क्योंकि उसने राम की पत्नी सीता का अपहरण किया था, किन्तु भगवान् राम ने उसे पर्याप्त दण्ड दिया, जो संसार के इतिहास में अद्वितीय है। तथापि अर्जुन के प्रसंग में एक विशेष प्रकार के आततायियों पर विचार करना चाहिए, अर्थात् उसके अपने पितामह, अपने गुरु, मित्र, पुत्र, पौत्र आदि। उनके कारण अर्जुन ने सोचा कि उसे वे कठोर पग नहीं उठाने चाहिए जो सामान्य आततायियों के विरुद्ध आवश्यक होते हैं। इसके अतिरिक्त, साधु पुरुषों को क्षमा करने का परामर्श दिया जाता है। साधु पुरुषों के लिए ऐसे आदेश किसी भी राजनीतिक आपात स्थिति से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। अर्जुन ने विचार किया कि राजनीतिक कारणों से अपने ही स्वजनों का वध करने की अपेक्षा, धर्म तथा साधु आचरण के आधार पर उन्हें क्षमा कर देना श्रेयस्कर होगा। अतएव उसने ऐसे वध को केवल क्षणिक देहसुख के लिए लाभकारी नहीं माना। आखिर राज्य तथा उससे प्राप्त सुख स्थायी नहीं हैं, तो वह अपने ही स्वजनों का वध करके अपने प्राण तथा अपने नित्य कल्याण को संकट में क्यों डाले? इस सन्दर्भ में अर्जुन का श्रीकृष्ण को “माधव” अर्थात् लक्ष्मी के पति कहकर सम्बोधित करना भी सार्थक है। वह श्रीकृष्ण को यह संकेत करना चाहता था कि लक्ष्मीपति होने के नाते उन्हें अर्जुन को ऐसे कार्य के लिए प्रेरित नहीं करना चाहिए जो अन्ततः अमंगल लाए। किन्तु श्रीकृष्ण कभी किसी का अमंगल नहीं करते, फिर अपने भक्तों का तो कहना ही क्या।