हि

अध्याय 1 · 31 / 39

1.37-38

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३७ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मन्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३८ ॥

yadi—यदि; api—निश्चय ही; ete—वे; na—नहीं; paśyanti—देखते; lobha—लोभ; upahata—से अभिभूत; cetasaḥ—हृदय; kula-kṣaya—कुल के विनाश में; kṛtam—किया गया; doṣam—दोष; mitra-drohe—मित्रों से विरोध में; ca—भी; pātakam—पापमय प्रतिक्रिया; katham—क्यों; na—नहीं; jñeyam—यह जानें; asmābhiḥ—हमारे द्वारा; pāpāt—पापों से; asmāt—अपने को; nivartitum—विरत होने को; kula-kṣaya—वंश के विनाश; kṛtam—ऐसा करने से; doṣam—अपराध; prapaśyadbhiḥ—देख सकने वालों के द्वारा; janārdana—हे श्रीकृष्ण।

हे जनार्दन, यद्यपि लोभ से अभिभूत ये पुरुष परिवार के नाश अथवा मित्रों से विरोध में कोई दोष नहीं देखते, तथापि हम, जो इस पाप को जानते हैं, इन कर्मों में प्रवृत्त क्यों हों?

किसी क्षत्रिय से यह अपेक्षित नहीं कि वह किसी प्रतिपक्षी दल द्वारा आमन्त्रित किए जाने पर युद्ध अथवा द्यूत से इनकार करे। ऐसे बन्धन के अधीन अर्जुन युद्ध से इनकार नहीं कर सकता था, क्योंकि उसे दुर्योधन के दल ने चुनौती दी थी। इस सन्दर्भ में अर्जुन ने विचार किया कि सम्भवतः प्रतिपक्षी दल ऐसी चुनौती के परिणामों के प्रति अन्धा हो। किन्तु अर्जुन उन अनिष्टकारी परिणामों को देख सकता था, अतः वह उस चुनौती को स्वीकार नहीं कर सका। बाध्यता वस्तुतः तभी बाँधती है जब उसका परिणाम शुभ हो, किन्तु जब परिणाम विपरीत हो, तब कोई भी बाध्य नहीं हो सकता। इन सब पक्षों एवं विपक्षों पर विचार करके अर्जुन ने युद्ध न करने का निश्चय किया।