हि

अध्याय 1 · 37 / 39

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अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४४ ॥

ahaḥ—हाय; bata—कितना विचित्र है; mahat—महान्; pāpam—पाप; kartum—करने को; vyavasitāḥ—निश्चय किया है; vayam—हमने; yat—जिससे; rājya—राज्य; sukha-lobhena—राज्यसुख के लोभ से प्रेरित; hantum—मारने को; svajanam—स्वजन; udyatāḥ—उद्यत।

हाय, कितना विचित्र है कि हम महान् पापमय कर्म करने को उद्यत हैं, राज्यसुख भोगने की इच्छा से प्रेरित होकर।

स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से प्रेरित होकर मनुष्य ऐसे पापमय कर्मों की ओर प्रवृत्त हो सकता है, जैसे अपने ही भाई, पिता अथवा माता का वध। संसार के इतिहास में ऐसे अनेक दृष्टान्त हैं। किन्तु अर्जुन, भगवान् का साधु-स्वभाव भक्त होने के कारण, नैतिक सिद्धान्तों के प्रति सदा सचेत रहता है, अतएव ऐसे कर्मों से बचने का ध्यान रखता है।