अध्याय 1 · 38 / 39
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यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४५ ॥
yadi—भले ही; mām—मुझे; apratīkāram—प्रतिरोध न करते हुए; aśastram—पूर्णतया सुसज्जित न होते हुए; śastra-pāṇayaḥ—हाथों में शस्त्र लिए हुए; dhārtarāṣṭrāḥ—धृतराष्ट्र के पुत्र; raṇe—युद्धभूमि में; hanyuḥ—मार डालें; tat—वह; me—मेरे लिए; kṣemataram—श्रेयस्कर; bhavet—होगा।
मैं इसे श्रेयस्कर समझूँगा कि धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ निःशस्त्र तथा प्रतिरोध न करने वाले को मार डालें, बजाय इसके कि मैं उनसे युद्ध करूँ।
क्षत्रिय युद्ध के सिद्धान्तों के अनुसार यह प्रथा है कि किसी निःशस्त्र तथा अनिच्छुक शत्रु पर आक्रमण नहीं करना चाहिए। किन्तु अर्जुन ने ऐसी विषम स्थिति में निश्चय किया कि यदि शत्रु उस पर आक्रमण करें तो भी वह युद्ध नहीं करेगा। उसने यह विचार नहीं किया कि प्रतिपक्षी दल युद्ध के लिए कितना उद्यत था। ये सभी लक्षण उस कोमल हृदयता के कारण हैं जो भगवान् का महान् भक्त होने से उत्पन्न होती है।