अध्याय 10 · 12 / 40
10.14
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
सर्वम्—समस्त; एतत्—ये; ऋतम्—सत्य; मन्ये—स्वीकार करता हूँ; यत्—जो; माम्—मुझसे; वदसि—आप कहते हैं; केशव—हे श्रीकृष्ण; न—कभी नहीं; हि—निश्चय ही; ते—आपका; भगवन्—हे भगवन्; व्यक्तिम्—प्राकट्य; विदुः—जान सकते हैं; देवाः—देवता; न—न ही; दानवाः—असुर।
हे श्रीकृष्ण! जो कुछ आपने मुझसे कहा है, उस समस्त को मैं पूर्णतः सत्य रूप में स्वीकार करता हूँ। हे भगवन्! न तो देवता और न ही असुर आपके स्वरूप को जानते हैं।
अर्जुन यहाँ इसकी पुष्टि करता है कि श्रद्धाहीन तथा आसुरी प्रकृति के व्यक्ति श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकते। उन्हें तो देवता भी नहीं जानते, फिर इस आधुनिक संसार के तथाकथित विद्वानों की तो बात ही क्या? परमेश्वर की कृपा से अर्जुन ने समझ लिया है कि परम सत्य श्रीकृष्ण हैं और कि वे पूर्ण हैं। अतः मनुष्य को अर्जुन के मार्ग का अनुगमन करना चाहिए। उसे भगवद्गीता का अधिकार प्राप्त हुआ। जैसा कि चौथे अध्याय में वर्णित है, भगवद्गीता को समझने हेतु गुरु-परम्परा की परम्परा-पद्धति लुप्त हो गई थी, और इसीलिए श्रीकृष्ण ने उस गुरु-परम्परा को अर्जुन के साथ पुनः स्थापित किया, क्योंकि उन्होंने अर्जुन को अपना घनिष्ठ मित्र तथा महान् भक्त माना। अतः, जैसा कि हमारी गीतोपनिषद् की भूमिका में वर्णित है, भगवद्गीता को परम्परा-पद्धति में ही समझा जाना चाहिए। जब परम्परा-पद्धति लुप्त हो गई, तब अर्जुन को उसके पुनरुज्जीवन हेतु पुनः चुना गया। श्रीकृष्ण जो कुछ कहते हैं, उस समस्त की अर्जुन द्वारा स्वीकृति का अनुकरण किया जाना चाहिए; तभी हम भगवद्गीता के सार को समझ सकते हैं, और तभी हम समझ सकते हैं कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।