हि

अध्याय 10 · 13 / 40

10.15

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥

स्वयम्—व्यक्तित्व; एव—निश्चय ही; आत्मना—स्वयं अपने द्वारा; आत्मानम्—स्वयं को; वेत्थ—जानते हैं; त्वम्—आप; पुरुषोत्तम—हे समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ; भूत-भावन—हे समस्त के उद्गम; भूतेश—हे समस्त के स्वामी; देव-देव—हे समस्त देवताओं के स्वामी; जगत्-पते—हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी।

हे समस्त के उद्गम, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, हे देवों के देव, हे पुरुषोत्तम, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी! निश्चय ही आप अपनी ही शक्तियों से स्वयं अपने आपको जानते हैं।

परमेश्वर श्रीकृष्ण को वे ही व्यक्ति जान सकते हैं, जो अर्जुन तथा उनके उत्तराधिकारियों के समान भक्तियोग के अनुष्ठान द्वारा उनके साथ सम्बन्ध में रहते हैं। आसुरी अथवा नास्तिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति श्रीकृष्ण को नहीं जान सकते। जो मानसिक कल्पना मनुष्य को परमेश्वर से दूर ले जाती है, वह गम्भीर पाप है, और जो श्रीकृष्ण को नहीं जानता, उसे भगवद्गीता पर टीका करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। भगवद्गीता श्रीकृष्ण की वाणी है, और चूँकि यह श्रीकृष्ण का विज्ञान है, अतः इसे श्रीकृष्ण से ही उसी प्रकार समझना चाहिए जिस प्रकार अर्जुन ने इसे समझा। इसे नास्तिक व्यक्तियों से ग्रहण नहीं करना चाहिए।

परम सत्य की अनुभूति तीन रूपों में होती है—निराकार ब्रह्म के रूप में, स्थानिक परमात्मा के रूप में तथा अन्ततः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में। अतः परम सत्य को समझने की अन्तिम अवस्था में मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तक पहुँचता है। कोई मुक्त पुरुष तथा सामान्य मनुष्य भी निराकार ब्रह्म अथवा स्थानिक परमात्मा की अनुभूति कर सकता है, तथापि वह भगवद्गीता के श्लोकों से भगवान् के व्यक्तित्व को नहीं समझ पाता, जिन श्लोकों को यही व्यक्ति, श्रीकृष्ण, कह रहे हैं। कभी-कभी निर्विशेषवादी श्रीकृष्ण को भगवान् के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, अथवा उनके अधिकार को मान लेते हैं। तथापि अनेक मुक्त व्यक्ति श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम, परम पुरुष तथा समस्त जीवों के पिता के रूप में नहीं समझ पाते। इसी कारण अर्जुन उन्हें पुरुषोत्तम कहकर सम्बोधित करते हैं। और यदि कोई उन्हें समस्त जीवों के पिता के रूप में जान भी ले, तो भी संभव है कि वह उन्हें परम नियन्ता के रूप में न जाने; अतः यहाँ उन्हें भूतेश, अर्थात् सबका परम नियन्ता, कहकर सम्बोधित किया गया है। और यदि कोई श्रीकृष्ण को समस्त जीवों के परम नियन्ता के रूप में जान भी ले, तो भी संभव है कि वह यह न जाने कि वे समस्त देवताओं के उद्गम हैं; अतः यहाँ उन्हें देवदेव, अर्थात् समस्त देवताओं के पूज्य देव, कहकर सम्बोधित किया गया है। और यदि कोई उन्हें समस्त देवताओं के पूज्य देव के रूप में जान भी ले, तो भी संभव है कि वह यह न जाने कि वे समस्त वस्तुओं के परम स्वामी हैं; अतः उन्हें जगत्पति कहकर सम्बोधित किया गया है। इस प्रकार इस श्लोक में अर्जुन की अनुभूति द्वारा श्रीकृष्ण के विषय में सत्य स्थापित होता है, और श्रीकृष्ण को यथारूप समझने के लिए हमें अर्जुन के पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए।