अध्याय 10 · 16 / 40
10.18
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥
विस्तरेण—वर्णन में; आत्मनः—अपने; योगम्—योगशक्ति; विभूतिम्—ऐश्वर्य; च—भी; जनार्दन—हे नास्तिकों के संहारक; भूयः—पुनः; कथय—वर्णन करें; तृप्तिः—तृप्ति; हि—निश्चय ही; शृण्वतः—सुनते हुए; न अस्ति—नहीं है; मे—मेरी; अमृतम्—अमृत।
हे जनार्दन [श्रीकृष्ण], मुझे पुनः अपनी प्रबल योगशक्तियों तथा महिमाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करें, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति कभी नहीं होती।
इसी प्रकार का कथन नैमिषारण्य के ऋषियों ने, जिनके अग्रणी शौनक थे, सूत गोस्वामी से कहा था। वह कथन इस प्रकार है:
vayaṁ tu na vitṛpyāma uttama-śloka-vikrame
yac chṛṇvatāṁ rasa-jñānāṁ svādu svādu pade pade.
“वैदिक स्तुतियों द्वारा गुणगान किए जाने वाले श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं को निरन्तर सुनते हुए भी मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो पाता। जिन्होंने श्रीकृष्ण के साथ दिव्य सम्बन्ध स्थापित किया है, वे भगवान् की लीलाओं के वर्णनों का पग-पग पर आस्वादन करते हैं।” इस प्रकार अर्जुन श्रीकृष्ण के विषय में सुनने के लिए उत्सुक हैं, विशेषतः यह कि वे सर्वव्यापी परमेश्वर के रूप में किस प्रकार विराजमान रहते हैं।
अब जहाँ तक अमृत का सम्बन्ध है, श्रीकृष्ण से सम्बन्धित कोई भी कथा अथवा कथन अमृत के ही समान है। और इस अमृत का अनुभव व्यावहारिक रूप से किया जा सकता है। आधुनिक कथाएँ, कल्पित आख्यान तथा इतिहास भगवान् की दिव्य लीलाओं से इस प्रकार भिन्न हैं कि मनुष्य लौकिक कथाओं को सुनते-सुनते थक जाएगा, किन्तु श्रीकृष्ण के विषय में सुनते हुए वह कभी नहीं थकता। केवल इसी कारण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का इतिहास भगवान् के अवतारों की लीलाओं के सन्दर्भों से परिपूर्ण है। उदाहरणार्थ, पुराण बीते हुए युगों के इतिहास हैं, जो भगवान् के विभिन्न अवतारों की लीलाओं का वर्णन करते हैं। इस प्रकार पठन-सामग्री बारम्बार पढ़े जाने पर भी सदा नवीन बनी रहती है।