अध्याय 10 · 17 / 40
10.19
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; हन्त—हाँ; ते—तुमसे; कथयिष्यामि—मैं कहूँगा; दिव्याः—दिव्य; हि—निश्चय ही; आत्म-विभूतयः—अपने ऐश्वर्य; प्राधान्यतः—प्रमुख रूप से; कुरुश्रेष्ठ—हे कुरुश्रेष्ठ; न अस्ति—नहीं है; अन्तः—सीमा; विस्तरस्य—विस्तार की; मे—मेरे।
श्रीभगवान् ने कहा: हाँ, मैं तुम्हें अपनी ऐश्वर्यमयी विभूतियों का वर्णन करूँगा, किन्तु केवल उन्हीं का जो प्रमुख हैं, हे अर्जुन, क्योंकि मेरा ऐश्वर्य असीम है।
श्रीकृष्ण की महानता तथा उनके ऐश्वर्यों को पूर्णतया समझ पाना संभव नहीं है। व्यष्टि आत्मा की इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं और उसे श्रीकृष्ण के समग्र कार्य-कलापों को समझने नहीं देतीं। फिर भी भक्तगण श्रीकृष्ण को समझने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु इस सिद्धान्त पर नहीं कि वे किसी विशिष्ट समय अथवा जीवन की किसी अवस्था में श्रीकृष्ण को पूर्णतया समझ सकेंगे। अपितु, श्रीकृष्ण से सम्बन्धित विषय ही इतने आस्वाद्य हैं कि वे उन्हें अमृत के समान प्रतीत होते हैं। इस प्रकार वे उनका आनन्द लेते हैं। श्रीकृष्ण के ऐश्वर्यों तथा उनकी विविध शक्तियों की चर्चा करते हुए शुद्ध भक्तगण दिव्य आनन्द प्राप्त करते हैं। अतः वे उन्हें सुनना तथा उनकी चर्चा करना चाहते हैं। श्रीकृष्ण जानते हैं कि जीव उनके ऐश्वर्यों के विस्तार को नहीं समझते; अतः वे अपनी विभिन्न शक्तियों के केवल प्रमुख प्रकटीकरणों को ही बताने के लिए सहमत होते हैं। प्राधान्यतः (प्रमुख रूप से) शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हम परमेश्वर के केवल कुछ ही प्रमुख विवरणों को समझ सकते हैं, क्योंकि उनकी विशेषताएँ असीम हैं। उन सबको समझ पाना संभव नहीं है। और इस श्लोक में प्रयुक्त विभूति शब्द उन ऐश्वर्यों की ओर संकेत करता है, जिनके द्वारा वे सम्पूर्ण प्रकटीकरण को नियन्त्रित करते हैं। अमरकोश शब्दकोश में कहा गया है कि विभूति किसी असाधारण ऐश्वर्य का सूचक है।
निर्विशेषवादी अथवा सर्वेश्वरवादी न तो परमेश्वर के असाधारण ऐश्वर्यों को समझ सकता है, और न ही उनकी दिव्य शक्ति के प्रकटीकरणों को। भौतिक जगत् में तथा आध्यात्मिक जगत् में—दोनों में उनकी शक्तियाँ प्रत्येक प्रकार के प्रकटीकरण में वितरित हैं। अब श्रीकृष्ण उसका वर्णन कर रहे हैं जिसे सामान्य मनुष्य प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकता है; इस प्रकार उनकी विविध शक्ति के एक अंश का वर्णन इस रीति से किया जा रहा है।