अध्याय 10 · 18 / 40
10.20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
अहम्—मैं; आत्मा—आत्मा; गुडाकेश—हे अर्जुन; सर्व-भूत—समस्त जीवों के; आशय-स्थितः—हृदय में स्थित; अहम्—मैं हूँ; आदिः—उद्गम; च—भी; मध्यम्—मध्य; च—भी; भूतानाम्—समस्त जीवों का; अन्तः—अन्त; एव—निश्चय ही; च—और।
हे गुडाकेश, मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही समस्त प्राणियों का आदि, मध्य तथा अन्त हूँ।
इस श्लोक में अर्जुन को गुडाकेश कहकर सम्बोधित किया गया है, जिसका अर्थ है—वह जिसने निद्रा के अन्धकार पर विजय प्राप्त कर ली है। जो लोग अज्ञान के अन्धकार में सो रहे हैं, उनके लिए यह समझ पाना संभव नहीं है कि भगवान् भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में स्वयं को किस प्रकार प्रकट करते हैं। अतः श्रीकृष्ण का अर्जुन को यह सम्बोधन सार्थक है। चूँकि अर्जुन ऐसे अन्धकार से ऊपर हैं, अतः भगवान् अपनी विभिन्न विभूतियों का वर्णन करने के लिए सहमत होते हैं।
श्रीकृष्ण सर्वप्रथम अर्जुन को बताते हैं कि वे अपने प्रमुख विस्तार के बल पर सम्पूर्ण विश्व-प्रकटीकरण की आत्मा अर्थात् जीव हैं। भौतिक सृष्टि से पूर्व परमेश्वर अपने पूर्ण विस्तार द्वारा पुरुष-अवतारों को स्वीकार करते हैं, और उन्हीं से समस्त वस्तुओं का आरम्भ होता है। अतः वे आत्मा हैं, अर्थात् महत्तत्व अथवा विश्व-तत्त्वों की आत्मा हैं। समग्र भौतिक शक्ति सृष्टि का कारण नहीं है, अपितु वास्तव में महाविष्णु महत्तत्व अर्थात् समग्र भौतिक शक्ति में प्रवेश करते हैं। वे ही आत्मा हैं। जब महाविष्णु प्रकटित ब्रह्माण्डों में प्रवेश करते हैं, तब वे प्रत्येक जीव में पुनः परमात्मा के रूप में स्वयं को प्रकट करते हैं। हमें यह अनुभव है कि जीव का व्यष्टि शरीर आध्यात्मिक स्फुलिंग की उपस्थिति के कारण विद्यमान रहता है। आध्यात्मिक स्फुलिंग के अस्तित्व के बिना शरीर का विकास नहीं हो सकता। इसी प्रकार, जब तक श्रीकृष्ण की परम आत्मा प्रवेश नहीं करती, तब तक भौतिक प्रकटीकरण का विकास नहीं हो सकता।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् समस्त प्रकटित ब्रह्माण्डों में परमात्मा के रूप में विद्यमान हैं। तीन पुरुषावतारों का वर्णन श्रीमद्भागवत में दिया गया है। “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् इस भौतिक प्रकटीकरण में तीन रूप प्रकट करते हैं—कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु तथा क्षीरोदकशायी विष्णु।” समस्त कारणों के कारण परमेश्वर श्रीकृष्ण महाविष्णु अथवा कारणोदकशायी विष्णु के रूप में विश्व-सागर में शयन करते हैं, अतः श्रीकृष्ण ही इस ब्रह्माण्ड के आदि हैं, विश्व-प्रकटीकरण के पालनकर्ता हैं, तथा समस्त शक्ति के अन्त हैं।