अध्याय 10 · 19 / 40
10.21
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
आदित्यानाम्—आदित्यों में; अहम्—मैं हूँ; विष्णुः—परमेश्वर; ज्योतिषाम्—समस्त ज्योतियों में; रविः—सूर्य; अंशुमान्—देदीप्यमान; मरीचिः—मरीचि; मरुताम्—मरुतों में; अस्मि—मैं हूँ; नक्षत्राणाम्—नक्षत्रों में; अहम्—मैं हूँ; शशी—चन्द्रमा।
आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, ज्योतियों में मैं देदीप्यमान सूर्य हूँ, मरुतों में मैं मरीचि हूँ, तथा नक्षत्रों में मैं चन्द्रमा हूँ।
बारह आदित्य हैं, जिनमें श्रीकृष्ण प्रमुख हैं। और आकाश में टिमटिमाती समस्त ज्योतियों में सूर्य प्रधान है, तथा ब्रह्मसंहिता में सूर्य को परमेश्वर का देदीप्यमान तेज स्वीकार किया गया है और उन्हीं के नेत्रों में से एक माना गया है। मरीचि स्वर्गीय अन्तरिक्षों के अधिष्ठाता देवता हैं। नक्षत्रों में चन्द्रमा रात्रि में सबसे अधिक प्रमुख है, अतः चन्द्रमा श्रीकृष्ण का प्रतिनिधित्व करता है।