हि

अध्याय 10 · 21 / 40

10.23

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥

रुद्राणाम्—समस्त रुद्रों में; शङ्करः—शिवजी; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; वित्तेशः—कोश का स्वामी; यक्ष-रक्षसाम्—यक्षों तथा राक्षसों में; वसूनाम्—वसुओं में; पावकः—अग्नि; च—भी; अस्मि—मैं हूँ; मेरुः—मेरु; शिखरिणाम्—समस्त पर्वतों में; अहम्—मैं हूँ।

समस्त रुद्रों में मैं शिवजी हूँ; यक्षों तथा राक्षसों में मैं धन का स्वामी [कुबेर] हूँ; वसुओं में मैं अग्नि हूँ, तथा पर्वतों में मैं मेरु हूँ।

ग्यारह रुद्र हैं, जिनमें शङ्कर अर्थात् शिवजी प्रमुख हैं। वे ब्रह्माण्ड में तमोगुण के अधिष्ठाता परमेश्वर के अवतार हैं। देवताओं में कुबेर प्रधान कोषाध्यक्ष हैं, और वे परमेश्वर के प्रतिनिधि हैं। मेरु एक पर्वत है, जो अपने समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है।