अध्याय 10 · 22 / 40
10.24
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
पुरोधसाम्—समस्त पुरोहितों में; च—भी; मुख्यम्—प्रमुख; माम्—मुझे; विद्धि—जानो; पार्थ—हे पृथापुत्र; बृहस्पतिम्—बृहस्पति; सेनानीनाम्—समस्त सेनापतियों में; अहम्—मैं हूँ; स्कन्दः—कार्तिकेय; सरसाम्—समस्त जलाशयों में; अस्मि—मैं हूँ; सागरः—समुद्र।
हे अर्जुन, पुरोहितों में मुझे प्रमुख बृहस्पति जानो, जो भक्ति के स्वामी हैं। सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ, जो युद्ध के स्वामी हैं; तथा जलाशयों में मैं समुद्र हूँ।
इन्द्र स्वर्गलोकों के प्रमुख देवता हैं और स्वर्ग के राजा के रूप में जाने जाते हैं। जिस लोक पर वे शासन करते हैं, वह इन्द्रलोक कहलाता है। बृहस्पति इन्द्र के पुरोहित हैं, और चूँकि इन्द्र समस्त राजाओं में प्रमुख हैं, अतः बृहस्पति समस्त पुरोहितों में प्रमुख हैं। और जिस प्रकार इन्द्र समस्त राजाओं में प्रमुख हैं, उसी प्रकार पार्वती तथा शिवजी के पुत्र स्कन्द समस्त सेनापतियों में प्रमुख हैं। और समस्त जलाशयों में समुद्र सबसे विशाल है। श्रीकृष्ण के ये प्रतिनिधित्व उनकी महानता के केवल संकेत ही देते हैं।