हि

अध्याय 10 · 30 / 40

10.32

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥

सर्गाणाम्—समस्त सृष्टियों में; आदिः—आदि; अन्तः—अन्त; च—और; मध्यम्—मध्य; च—भी; एव—निश्चय ही; अहम्—मैं हूँ; अर्जुन—हे अर्जुन; अध्यात्म-विद्या—आध्यात्मिक ज्ञान; विद्यानाम्—समस्त विद्याओं में; वादः—स्वाभाविक निष्कर्ष; प्रवदताम्—तर्कों में; अहम्—मैं हूँ।

समस्त सृष्टियों में मैं आदि, अन्त तथा मध्य भी हूँ, हे अर्जुन! समस्त विद्याओं में मैं आत्मा का आध्यात्मिक विज्ञान हूँ, और तार्किकों में मैं निर्णायक सत्य हूँ।

सृष्ट प्रकटीकरणों में समस्त भौतिक तत्त्व सर्वप्रथम महाविष्णु द्वारा सृजित किए जाते हैं और भगवान् शिव द्वारा संहृत किए जाते हैं। ब्रह्मा गौण स्रष्टा हैं। ये समस्त सृष्ट तत्त्व परमेश्वर के भौतिक गुणों के विभिन्न अवतार हैं; अतः वे ही समस्त सृष्टि के आदि, मध्य तथा अन्त हैं।

आत्मा के आध्यात्मिक विज्ञान के विषय में अनेक ग्रन्थ हैं, जैसे चार वेद, वेदान्त-सूत्र तथा पुराण, श्रीमद्भागवत एवं गीता। ये सब श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि हैं। तार्किकों में तर्क की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। प्रमाण की प्रस्तुति जप कहलाती है। एक-दूसरे को पराजित करने का प्रयास वितण्डा कहलाता है, और अन्तिम निष्कर्ष वाद कहलाता है। निर्णायक सत्य, अर्थात् समस्त तर्क-प्रक्रियाओं का अन्त, श्रीकृष्ण हैं।