हि

अध्याय 10 · 37 / 40

10.39

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥

यत्—जो कुछ; च—भी; अपि—हो सकता है; सर्व-भूतानाम्—समस्त सृष्टियों का; बीजम्—बीज; तत्—वह; अहम्—मैं हूँ; अर्जुन—हे अर्जुन; न—नहीं; तत्—वह; अस्ति—है; विना—बिना; यत्—जो; स्यात्—विद्यमान रहे; मया—मेरे द्वारा; भूतम्—सृजित; चराचरम्—चर तथा अचर।

इसके अतिरिक्त, हे अर्जुन! मैं समस्त अस्तित्वों का उत्पादक बीज हूँ। ऐसा कोई प्राणी नहीं—चर अथवा अचर—जो मेरे बिना अस्तित्व में रह सके।

प्रत्येक वस्तु का कोई कारण होता है, और वह कारण अथवा प्रकटीकरण का बीज श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्ण की ऊर्जा के बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं रह सकता; अतः वे सर्वशक्तिमान् कहलाते हैं। उनकी सामर्थ्य के बिना न तो चर वस्तु अस्तित्व में रह सकती है, न अचर। जो भी अस्तित्व श्रीकृष्ण की ऊर्जा पर आधारित नहीं है, वह माया कहलाता है, अर्थात् जो नहीं है।