हि

अध्याय 10 · 38 / 40

10.40

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥

न—न तो; अन्तः—सीमा; अस्ति—है; मम—मेरी; दिव्यानाम्—दिव्य; विभूतीनाम्—विभूतियों की; परन्तप—हे शत्रुओं के विजेता; एषः—यह सब; तु—वह; उद्देशतः—उदाहरण; प्रोक्तः—कहा गया; विभूतेः—विभूतियों का; विस्तरः—विस्तार; मया—मेरे द्वारा।

हे शत्रुओं के पराक्रमी विजेता! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। मैंने तुमसे जो कहा है, वह तो मेरी अनन्त विभूतियों का केवल एक संकेत मात्र है।

जैसा कि वैदिक साहित्य में कहा गया है, यद्यपि परम की विभूतियाँ तथा ऊर्जाएँ विभिन्न प्रकारों से समझी जाती हैं, तथापि ऐसी विभूतियों की कोई सीमा नहीं है; अतः समस्त विभूतियों तथा ऊर्जाओं की व्याख्या नहीं की जा सकती। अर्जुन की जिज्ञासा को शान्त करने हेतु उन्हें केवल कुछ उदाहरण ही बताए जा रहे हैं।