अध्याय 10 · 39 / 40
10.41
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
यत् यत्—जो जो; विभूति—विभूतियों से; मत्—युक्त; सत्त्वम्—अस्तित्व; श्रीमत्—सुन्दर; ऊर्जितम्—गौरवशाली; एव—निश्चय ही; वा—अथवा; तत् तत्—वे सब; एव—निश्चय ही; अवगच्छ—तुम जान लो; त्वम्—तुम; मम—मेरे; तेजः—तेज; अंश—अंशमात्र; सम्भवम्—से उत्पन्न।
जान लो कि समस्त सुन्दर, गौरवशाली तथा सामर्थ्यवान् सृष्टियाँ मेरे तेज की केवल एक चिनगारी से उत्पन्न होती हैं।
किसी भी गौरवशाली अथवा सुन्दर अस्तित्व को श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य का केवल एक अंशमात्र प्रकटीकरण समझना चाहिए, चाहे वह आध्यात्मिक जगत् में हो अथवा भौतिक जगत् में। किसी भी असाधारण रूप से ऐश्वर्ययुक्त वस्तु को श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य का प्रतिनिधि मानना चाहिए।