अध्याय 10 · 40 / 40
10.42
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
अथवा—अथवा; बहुना—बहुत; एतेन—इस प्रकार के; किम्—क्या; ज्ञातेन—जानकर; तव—तुम्हें; अर्जुन—हे अर्जुन; विष्टभ्य—सम्पूर्ण; अहम्—मैं; इदम्—इस; कृत्स्नम्—समस्त प्रकटीकरणों को; एक—एक; अंशेन—अंश से; स्थितः—स्थित; जगत्—ब्रह्माण्ड में।
किन्तु हे अर्जुन! इस समस्त विस्तृत ज्ञान की क्या आवश्यकता है? मैं अपने एक अंशमात्र से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर इसे धारण करता हूँ।
परमेश्वर समस्त भौतिक ब्रह्माण्डों में परमात्मा के रूप में समस्त वस्तुओं में प्रवेश करके प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान् यहाँ अर्जुन से कहते हैं कि यह जानने का कोई प्रयोजन नहीं कि वस्तुएँ अपने पृथक् ऐश्वर्य तथा वैभव में किस प्रकार विद्यमान हैं। उसे यह जान लेना चाहिए कि समस्त वस्तुएँ इसी कारण विद्यमान हैं कि श्रीकृष्ण ने परमात्मा के रूप में उनमें प्रवेश किया है। ब्रह्मा, जो सबसे विशाल सत्ता हैं, से लेकर सबसे छोटी चींटी तक, सब इसीलिए विद्यमान हैं कि भगवान् ने प्रत्येक तथा समस्त में प्रवेश किया है और उन्हें धारण किए हुए हैं।
यहाँ देवताओं की आराधना को निरुत्साहित किया गया है, क्योंकि ब्रह्मा तथा शिव जैसे महानतम देवता भी परमेश्वर के ऐश्वर्य के केवल अंशमात्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे ही प्रत्येक जन्म लेने वाले के उद्गम हैं, और कोई उनसे महान् नहीं है। वे समता हैं, अर्थात् कोई उनसे श्रेष्ठ नहीं है और कोई उनके समान नहीं है। विष्णु-मन्त्र में कहा गया है कि जो परमेश्वर श्रीकृष्ण को देवताओं के—चाहे वे ब्रह्मा हों अथवा शिव—समान श्रेणी में मानता है, वह तत्क्षण नास्तिक हो जाता है। किन्तु यदि कोई श्रीकृष्ण की ऊर्जा के ऐश्वर्यों तथा विस्तारों के विभिन्न वर्णनों का भली-भाँति अध्ययन करे, तो वह बिना किसी सन्देह के भगवान् श्रीकृष्ण की स्थिति को समझ सकता है और बिना विचलित हुए अपने मन को श्रीकृष्ण की आराधना में स्थिर कर सकता है। भगवान् अपने अंशमात्र प्रतिनिधि परमात्मा के विस्तार द्वारा सर्वव्यापी हैं, जो प्रत्येक विद्यमान वस्तु में प्रवेश करते हैं। अतः शुद्ध भक्तगण पूर्ण भक्ति में अपने मन को कृष्णभावनामृत में केन्द्रित करते हैं; अतएव वे सदा दिव्य स्थिति में स्थित रहते हैं। इस अध्याय में आठवें से ग्यारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण की भक्ति तथा आराधना का अत्यन्त स्पष्ट निर्देश है। यही शुद्ध भक्ति का मार्ग है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की संगति की उच्चतम भक्तिमयी सिद्धि किस प्रकार प्राप्त की जाए, इसे इस अध्याय में भली-भाँति समझाया गया है।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय “परम के ऐश्वर्य” विषयक भक्तिवेदान्त तात्पर्यों की समाप्ति होती है।