अध्याय 10 · 5 / 40
10.6
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥
महर्षयः—महान् ऋषि; सप्त—सात; पूर्वे—पूर्व; चत्वारः—चार; मनवः—मनु; तथा—भी; मत्-भावाः—मुझसे उत्पन्न; मानसाः—मन से; जाताः—उत्पन्न; येषाम्—उनके; लोके—लोकों में; इमाः—यह सब; प्रजाः—जनसंख्या।
सात महान् ऋषि और उनसे पूर्व चार अन्य महान् ऋषि तथा मनु [मानव-जाति के जनक] मेरे मन से उत्पन्न होते हैं, और इन लोकों के समस्त प्राणी उन्हीं से उद्भूत होते हैं।
भगवान् ब्रह्माण्ड की जनसंख्या का एक वंशावली-सारांश दे रहे हैं। ब्रह्मा वह आदि प्राणी हैं जो परमेश्वर की उस ऊर्जा से उत्पन्न हुए जिसे हिरण्यगर्भ कहते हैं। और ब्रह्मा से समस्त सात महान् ऋषि, तथा उनसे पूर्व चार अन्य महान् ऋषि—जिनके नाम सनक, सनन्द, सनातन तथा सनत्कुमार हैं—एवं चौदह मनु प्रकट होते हैं। ये समस्त पच्चीस महान् ऋषि समूचे ब्रह्माण्ड में जीवों के पितामह रूप में जाने जाते हैं। असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के भीतर असंख्य लोक हैं, और प्रत्येक लोक विभिन्न प्रकार की जनसंख्या से परिपूर्ण है। ये सभी इन्हीं पच्चीस पितामहों से उत्पन्न हैं। ब्रह्मा ने यह जानने से पूर्व कि सृष्टि कैसे करनी है, देवताओं के एक सहस्र वर्ष तक तपस्या की, और तब श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें यह बोध हुआ। तत्पश्चात् ब्रह्मा से सनक, सनन्द, सनातन तथा सनत्कुमार प्रकट हुए, फिर रुद्र, और तत्पश्चात् सात ऋषि; और इस प्रकार समस्त ब्राह्मण तथा क्षत्रिय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की ऊर्जा से उत्पन्न हुए। ब्रह्मा पितामह, अर्थात् बाबा, रूप में जाने जाते हैं, और श्रीकृष्ण प्रपितामह, अर्थात् पितामह के पिता, रूप में जाने जाते हैं। इसका कथन भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में है। (गीता 11.39)