अध्याय 10 · 6 / 40
10.7
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
एताम्—यह सब; विभूतिम्—ऐश्वर्य; योगम् च—तथा योगशक्ति; मम—मेरी; यः—जो कोई; वेत्ति—जानता है; तत्त्वतः—तथ्यतः; सः—वह; अविकम्पेन—अविचलित; योगेन—भक्ति में; युज्यते—संलग्न होता है; न—कभी नहीं; अत्र—यहाँ; संशयः—सन्देह।
जो मेरे इस वैभव तथा शक्ति को वस्तुतः जानता है, वह अनन्य भक्ति में संलग्न होता है; इसमें कोई सन्देह नहीं है।
आध्यात्मिक सिद्धि का सर्वोच्च शिखर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का ज्ञान है। जब तक मनुष्य परमेश्वर के विभिन्न ऐश्वर्यों के विषय में दृढ़ रूप से आश्वस्त नहीं होता, तब तक वह भक्ति में संलग्न नहीं हो सकता। सामान्यतः लोग जानते हैं कि ईश्वर महान् हैं, किन्तु वे विस्तार से नहीं जानते कि ईश्वर कैसे महान् हैं। यहाँ वह विस्तार दिया गया है। यदि मनुष्य तथ्यतः जान ले कि ईश्वर कैसे महान् हैं, तो स्वभावतः वह शरणागत आत्मा बन जाता है और स्वयं को भगवान् की भक्ति में संलग्न कर लेता है। जब मनुष्य परमेश्वर के ऐश्वर्यों को तथ्यतः जान लेता है, तब उनके प्रति शरणागत होने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता। यह तथ्यपरक ज्ञान श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता एवं वैसे ही ग्रन्थों के वर्णनों से जाना जा सकता है।
इस ब्रह्माण्ड के संचालन में अनेक देवता ग्रह-व्यवस्था में वितरित हैं, और उनमें प्रमुख हैं ब्रह्मा, भगवान् शिव तथा चार महान् कुमार एवं अन्य पितामह। ब्रह्माण्ड की जनसंख्या के अनेक पूर्वज हैं, और वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण से उत्पन्न हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण समस्त पूर्वजों के आदि पूर्वज हैं।
ये परमेश्वर के कुछ ऐश्वर्य हैं। जब मनुष्य इनके विषय में दृढ़ रूप से आश्वस्त हो जाता है, तब वह श्रीकृष्ण को महान् श्रद्धा सहित तथा बिना किसी सन्देह के स्वीकार कर लेता है, और भक्ति में संलग्न हो जाता है। यह समस्त विशिष्ट ज्ञान इसलिए आवश्यक है ताकि भगवान् की प्रेमाभक्ति में मनुष्य की रुचि बढ़े। मनुष्य को यह भली-भाँति समझने की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि श्रीकृष्ण कितने महान् हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण की महत्ता को जानकर मनुष्य निष्कपट भक्ति में स्थिर हो सकेगा।