अध्याय 11 · 10 / 52
11.10-11
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
अनेक—विविध; वक्त्र—मुख; नयनम्—नेत्र; अनेक—विविध; अद्भुत—आश्चर्यजनक; दर्शनम्—दृश्य; अनेक—अनेक; दिव्य—दिव्य; आभरणम्—आभूषण; दिव्य—दिव्य; अनेक—विविध; उद्यत—उठाए हुए; आयुधम्—आयुध; दिव्य—दिव्य; माल्य—मालाएँ; अम्बर-धरम्—वस्त्रों से युक्त; दिव्य—दिव्य; गन्ध—सुगन्ध; अनुलेपनम्—लेपित; सर्व—समस्त; अश्चर्यमयम्—आश्चर्यजनक; देवम्—देदीप्यमान; अनन्तम्—असीम; विश्वतः-मुखम्—सर्वव्यापी।
अर्जुन ने उस विश्वरूप में असीम मुख तथा असीम नेत्र देखे। वह सब कुछ आश्चर्यजनक था। वह रूप दिव्य, चकाचौंध करने वाले आभूषणों से सुसज्जित था और अनेक वस्त्रों से सुशोभित था। वे भव्य रूप से मालाओं से अलंकृत थे, और उनके शरीर पर अनेक सुगन्धियाँ लेपित थीं। सब कुछ अत्यन्त वैभवशाली, सर्वव्यापी तथा असीम था। यह सब अर्जुन ने देखा।
ये दो श्लोक यह संकेत करते हैं कि भगवान् के हाथों, मुखों, चरणों आदि का कोई अन्त नहीं है। ये प्रकटीकरण समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं और असीम हैं। भगवान् की कृपा से अर्जुन एक ही स्थान पर बैठे-बैठे इन्हें देख सके। यह श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्ति के कारण ही सम्भव हुआ।