अध्याय 11 · 16 / 52
11.17
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥
किरीटिनम्—मुकुटों सहित; गदिनम्—गदाओं सहित; चक्रिणम्—चक्रों सहित; च—और; तेजोराशिम्—तेजःपुञ्ज; सर्वतः—सब ओर; दीप्तिमन्तम्—देदीप्यमान; पश्यामि—मैं देखता हूँ; त्वाम्—आपको; दुर्निरीक्ष्यम्—देखने में कठिन; समन्तात्—सर्वत्र फैला हुआ; दीप्त-अनल—प्रज्वलित अग्नि; अर्क—सूर्य; द्युतिम्—प्रकाश; अप्रमेयम्—अपरिमेय।
विविध मुकुटों, गदाओं तथा चक्रों से सुशोभित आपका रूप अपने प्रचण्ड तेज के कारण देखने में कठिन है, जो प्रज्वलित अग्नि तथा सूर्य के समान अपरिमेय है।