अध्याय 11 · 17 / 52
11.18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥
tvam—आप; akṣaram—अविनाशी; paramam—परम; veditavyam—जानने योग्य; tvam—आप; asya—इस; viśvasya—विश्व के; param—परम; nidhānam—आधार; tvam—आप ही हैं; avyayaḥ—अविनाशी; śāśvata-dharma-goptā—सनातन धर्म के रक्षक; sanātanaḥ—सनातन; tvam—आप; puruṣaḥ—परम पुरुष; mataḥ me—यही मेरा मत है।
आप ही परम आदि लक्ष्य हैं; आप ही समस्त विश्वों में श्रेष्ठ हैं; आप अविनाशी हैं और आप ही सर्वप्राचीन हैं; आप ही धर्म के रक्षक तथा सनातन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।