अध्याय 11 · 18 / 52
11.19
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥
anādi—आदि रहित; madhya—मध्य रहित; antam—अन्त रहित; ananta—असीम; vīryam—महिमामय; ananta—असीम; bāhum—भुजाएँ; śaśi—चन्द्रमा; sūrya—सूर्य; netram—नेत्र; paśyāmi—मैं देखता हूँ; tvām—आपको; dīpta—प्रज्वलित; hutāśa-vaktram—आपके मुख से निकलती अग्नि; sva-tejasā—अपने तेज से; viśvam—इस विश्व को; idam—इस; tapantam—तपाते हुए।
आप ही आदि, मध्य तथा अन्त से रहित उद्गम हैं। आपकी असंख्य भुजाएँ हैं, और सूर्य तथा चन्द्रमा आपके महान् असीम नेत्रों में सम्मिलित हैं। अपने तेज से आप इस समस्त विश्व को तपा रहे हैं।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के छह ऐश्वर्यों की विस्तृति की कोई सीमा नहीं है। यहाँ तथा अन्य अनेक स्थलों पर पुनरावृत्ति है, किन्तु शास्त्रों के अनुसार श्रीकृष्ण की महिमा की पुनरावृत्ति कोई साहित्यिक दुर्बलता नहीं है। कहा जाता है कि विमोह, विस्मय अथवा महान् भावावेश के समय कथन बारम्बार दोहराए जाते हैं। यह कोई दोष नहीं है।