हि

अध्याय 11 · 19 / 52

11.20

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥

dyau—अन्तरिक्ष में; āpṛthivyoḥ—पृथ्वी का; idam—यह; antaram—मध्य में; hi—निश्चय ही; vyāptam—व्याप्त; tvayā—आपके द्वारा; ekena—एक के द्वारा; diśaḥ—दिशाएँ; ca—तथा; sarvāḥ—समस्त; dṛṣṭvā—देखकर; adbhutam—अद्भुत; rūpam—रूप; ugram—भयानक; tava—आपका; idam—यह; loka—लोक; trayam—तीन; pravyathitam—विचलित; mahātman—हे महान्।

यद्यपि आप एक हैं, तथापि आप समस्त आकाश, समस्त लोकों तथा उनके मध्य के समूचे अवकाश में व्याप्त हैं। हे महान्, आपके इस भयानक रूप को देखकर मैं देखता हूँ कि समस्त लोक विचलित हो रहे हैं।

इस श्लोक में dyāv āpṛthivyoḥ (स्वर्ग तथा पृथ्वी के मध्य का अवकाश) तथा loka-trayam (तीनों लोक) महत्त्वपूर्ण शब्द हैं, क्योंकि इससे प्रतीत होता है कि भगवान् के इस विश्वरूप को केवल अर्जुन ने ही नहीं देखा, अपितु अन्य लोकों के अन्य प्राणियों ने भी इसे देखा। यह दर्शन कोई स्वप्न नहीं था। दिव्य दृष्टि से युक्त जो भी आध्यात्मिक रूप से जाग्रत थे, उन सबने इसे देखा।