अध्याय 11 · 20 / 52
11.21
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
amī—वे सब; hi—निश्चय ही; tvām—आपमें; sura-saṅghāḥ—देवताओं के समूह; viśanti—प्रवेश कर रहे हैं; kecit—उनमें से कुछ; bhītāḥ—भयवश; prāñjalayaḥ—हाथ जोड़े हुए; gṛṇanti—प्रार्थना करते हुए; svasti—सर्वमंगल; iti—इस प्रकार; uktvā—ऐसा कहते हुए; maharṣi—महर्षि; siddha-saṅghāḥ—सिद्ध ऋषिगण; stuvanti—स्तुति-गान करते हुए; tvām—आपकी; stutibhiḥ—प्रार्थनाओं से; puṣkalābhiḥ—वैदिक स्तोत्रों से।
समस्त देवता आपकी शरण ले रहे हैं तथा आपमें प्रवेश कर रहे हैं। वे अत्यन्त भयभीत हैं, और हाथ जोड़े हुए वैदिक स्तोत्रों का गान कर रहे हैं।
समस्त लोकों के देवता विश्वरूप के इस भयंकर प्राकट्य तथा उसके देदीप्यमान तेज से भयभीत हो उठे, अतः उन्होंने रक्षा हेतु प्रार्थना की।