अध्याय 11 · 21 / 52
11.22
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
rudra—भगवान् शिव के प्राकट्य; ādityāḥ—आदित्यगण; vasavaḥ—वसुगण; ye—वे सब; ca—तथा; sādhyāḥ—साध्यगण; viśve—विश्वदेवगण; aśvinau—अश्विनीकुमार; marutaḥ—मरुद्गण; ca—तथा; uṣmapāḥ—पितृगण; ca—तथा; gandharva—गन्धर्वगण; yakṣa—यक्षगण; asura-siddha—असुर तथा सिद्ध देवगण; saṅghāḥ—समूह; vīkṣante—देख रहे हैं; tvām—आपको; vismitāḥ—विस्मयपूर्वक; ca—भी; eva—निश्चय ही; sarve—सब।
भगवान् शिव के विविध प्राकट्य, आदित्यगण, वसुगण, साध्यगण, विश्वदेवगण, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण, पितृगण तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर एवं समस्त सिद्ध देवगण आपको विस्मयपूर्वक निहार रहे हैं।