अध्याय 11 · 22 / 52
11.23
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥
rūpam—रूप; mahat—अति विशाल; te—आपका; bahu—अनेक; vaktra—मुख; netram—नेत्र; mahā-bāho—हे महाबाहो; bahu—अनेक; bāhu—भुजाएँ; ūru—जंघाएँ; pādam—पैर; bahu-udaram—अनेक उदर; bahu-daṁṣṭrā—अनेक दाँत; karālam—विकराल; dṛṣṭvā—देखकर; lokāḥ—समस्त लोक; pravyathitāḥ—विचलित; tathā—उसी प्रकार; aham—मैं।
हे महाबाहो, समस्त लोक अपने देवताओं सहित आपके अनेक मुखों, नेत्रों, भुजाओं, उदरों तथा पैरों एवं आपके विकराल दाँतों को देखकर विचलित हैं, और जैसे वे विचलित हैं, वैसे ही मैं भी हूँ।