अध्याय 11 · 23 / 52
11.24
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥
daṁṣṭrā—दाँत; karālāni—उस प्रकार; ca—भी; te—आपके; mukhāni—मुख; dṛṣṭvā—देखकर; eva—इस प्रकार; kālānala—मृत्यु की अग्नि; sannibhāni—मानो प्रज्वलित; diśaḥ—दिशाएँ; na jāne—नहीं जानता; na labhe—न ही पाता; ca śarma—तथा कृपा; prasīda—प्रसन्न हों; deveśa—हे समस्त ईश्वरों के ईश्वर; jagat-nivāsa—लोकों के आश्रय।
हे ईश्वरों के ईश्वर, हे लोकों के आश्रय, मुझ पर कृपालु हों। आपके इन प्रज्वलित मृत्यु-सदृश मुखों तथा भयानक दाँतों को इस प्रकार देखकर मैं अपना सन्तुलन नहीं रख पा रहा। समस्त दिशाओं में मैं विमोहित हूँ।