हि

अध्याय 11 · 24 / 52

11.25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥२५॥

daṁṣṭrā—दाँत; karālāni—उस प्रकार; ca—भी; te—आपके; mukhāni—मुख; dṛṣṭvā—देखकर; eva—इस प्रकार; kālānala—मृत्यु की अग्नि; sannibhāni—मानो प्रज्वलित; diśaḥ—दिशाएँ; na jāne—नहीं जानता; na labhe—न ही पाता; ca śarma—तथा कृपा; prasīda—प्रसन्न हों; deveśa—हे समस्त ईश्वरों के ईश्वर; jagat-nivāsa—लोकों के आश्रय।

हे ईश्वरों के ईश्वर, हे लोकों के आश्रय, मुझ पर कृपालु हों। आपके इन प्रज्वलित मृत्यु-सदृश मुखों तथा भयानक दाँतों को इस प्रकार देखकर मैं अपना सन्तुलन नहीं रख पा रहा। समस्त दिशाओं में मैं विमोहित हूँ।