हि

अध्याय 11 · 26 / 52

11.28

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥

yathā—जैसे; nadīnām—नदियों की; bahavaḥ—अनेक; ambu-vegāḥ—जल की तरंगें; samudram—समुद्र; eva—निश्चय ही; abhimukhāḥ—की ओर; dravanti—बहती हैं; tathā—उसी प्रकार; tava—आपके; amī—वे सब; nara-loka-vīrāḥ—मानव समाज के राजा; viśanti—प्रवेश कर रहे हैं; vaktrāṇi—मुखों में; abhivijvalanti—प्रज्वलित।

जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में जा मिलती हैं, उसी प्रकार ये समस्त महान् योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर विनष्ट हो रहे हैं।