हि

अध्याय 11 · 27 / 52

11.29

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥

yathā—जैसे; pradīptam—प्रज्वलित; jvalanam—अग्नि; pataṅgāḥ—पतंगे; viśanti—प्रवेश करते हैं; nāśāya—विनाश हेतु; samṛddha—पूर्ण; vegāḥ—वेग; tathā eva—उसी प्रकार; nāśāya—विनाश हेतु; viśanti—प्रवेश कर रहे; lokāḥ—समस्त लोग; tava—आपमें; api—भी; vaktrāṇi—मुखों में; samṛddha-vegāḥ—पूर्ण वेग से।

मैं देख रहा हूँ कि समस्त लोग पूर्ण वेग से आपके मुखों में उसी प्रकार दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं, जैसे पतंगे प्रज्वलित अग्नि में जा गिरते हैं।