अध्याय 11 · 32 / 52
11.34
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥
droṇam ca—द्रोण को भी; bhīṣmam ca—भीष्म को भी; jayadratham ca—जयद्रथ को भी; karṇam—कर्ण को भी; tathā—भी; anyān—अन्य; api—निश्चय ही; yodha-vīrān—महान् योद्धा; mayā—मेरे द्वारा; hatān—पहले से मारे गए; tvam—तुम; jahi—विजयी बनो; mā—कभी नहीं; vyathiṣṭhāḥ—विचलित हो; yudhyasva—केवल युद्ध करो; jetāsi—जीत लोगे; raṇe—युद्ध में; sapatnān—शत्रुओं को।
श्रीभगवान् ने कहा: समस्त महान् योद्धा — द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण — पहले से ही विनष्ट हो चुके हैं। केवल युद्ध करो, और तुम अपने शत्रुओं को परास्त कर दोगे।
प्रत्येक योजना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा रची जाती है, किन्तु वे अपने भक्तों पर इतने दयालु तथा कृपालु हैं कि उस श्रेय को अपने उन भक्तों को देना चाहते हैं जो उनकी इच्छा के अनुसार उनकी योजना को सम्पन्न करते हैं। अतः जीवन ऐसे चलना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करे और आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझे। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की योजनाएँ उनकी कृपा से समझी जाती हैं, और भक्तों की योजनाएँ उनकी योजनाओं के समान ही उत्तम होती हैं। मनुष्य को ऐसी योजनाओं का अनुसरण करना चाहिए और अस्तित्व के संघर्ष में विजयी होना चाहिए।