अध्याय 11 · 34 / 52
11.36
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६ ॥
arjunaḥ uvāca—अर्जुन ने कहा; sthāne—उचित ही; hṛṣīkeśa—हे समस्त इन्द्रियों के स्वामी; tava—आपकी; prakīrtya—महिमा से; jagat—समस्त संसार; prahṛṣyati—हर्षित हो रहा; anurajyate—अनुरक्त हो रहा; rakṣāṁsi—असुरगण; bhītāni—भयवश; diśaḥ—दिशाओं में; dravanti—भाग रहे; sarve—सब; namasyanti—नमस्कार करते हुए; ca—भी; siddha-saṅghāḥ—सिद्ध मनुष्यगण।
हे हृषीकेश, आपका नाम सुनकर संसार हर्षित हो उठता है, और इस प्रकार सब आपके प्रति अनुरक्त हो जाते हैं। यद्यपि सिद्ध प्राणी आपको सादर नमस्कार अर्पित करते हैं, तथापि असुर भयभीत हैं और वे इधर-उधर भाग रहे हैं। यह सब उचित ही है।
कुरुक्षेत्र के युद्ध के परिणाम के विषय में श्रीकृष्ण से सुनकर अर्जुन परमेश्वर का एक प्रबुद्ध भक्त बन गया। उसने स्वीकार किया कि श्रीकृष्ण द्वारा किया गया सब कुछ पूर्णतः उचित है। अर्जुन ने इस तथ्य की पुष्टि की कि श्रीकृष्ण भक्तों के पालक तथा उपासना के लक्ष्य हैं, एवं अवांछितों के संहारक हैं। उनके कर्म सभी के लिए समान रूप से कल्याणकारी हैं। यहाँ अर्जुन ने समझा कि जब कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्ति की ओर था, तब अन्तरिक्ष में अनेक देवता, सिद्ध तथा उच्च लोकों के बुद्धिमान् प्राणी उपस्थित थे, और वे युद्ध का अवलोकन कर रहे थे, क्योंकि श्रीकृष्ण वहाँ उपस्थित थे। जब अर्जुन ने भगवान् के विश्वरूप को देखा, तब देवताओं ने उसमें आनन्द लिया, किन्तु अन्य लोग, जो असुर तथा नास्तिक थे, भगवान् की स्तुति होने पर उसे सहन न कर सके। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विनाशकारी रूप के प्रति अपने स्वाभाविक भय के कारण वे भाग गए। भक्तों तथा नास्तिकों के प्रति श्रीकृष्ण के व्यवहार की अर्जुन प्रशंसा करता है। समस्त परिस्थितियों में भक्त भगवान् की महिमा का गान करता है, क्योंकि वह जानता है कि वे जो भी करते हैं वह सभी के लिए कल्याणकारी है।