अध्याय 11 · 35 / 52
11.37
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
kasmāt—क्यों; ca—भी; te—आपको; na—नहीं; nameran—समुचित नमस्कार करें; mahātman—हे महान्; garīyase—आप श्रेष्ठतर हैं; brahmaṇaḥ—ब्रह्मा से; api—यद्यपि; ādi-kartre—परम स्रष्टा; ananta—असीम; deveśa—देवताओं के देव; jagat-nivāsa—हे विश्व के आश्रय; tvam—आप हैं; akṣaram—अविनाशी; sat-asat—कारण और कार्य; tat-param—दिव्य; yat—क्योंकि।
हे महान्, जो ब्रह्मा से भी ऊपर विराजमान हैं, आप ही आदि स्वामी हैं। हे असीम, फिर वे आपको नमन क्यों न करें? हे विश्व के आश्रय, आप ही अजेय स्रोत हैं, समस्त कारणों के कारण हैं, तथा इस भौतिक प्रकटीकरण से परे दिव्य हैं।
इस नमस्कार-अर्पण के द्वारा अर्जुन यह संकेत करते हैं कि श्रीकृष्ण सभी के द्वारा आराध्य हैं। वे सर्वव्यापी हैं तथा प्रत्येक आत्मा की आत्मा हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण को महात्मा कहकर सम्बोधित करते हैं, जिसका अर्थ है कि वे परम उदार तथा असीम हैं। अनन्त यह सूचित करता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के प्रभाव तथा ऊर्जा से आच्छादित न हो, और देवेश का अर्थ है कि वे समस्त देवताओं के नियन्ता हैं तथा उन सबसे ऊपर हैं। वे सम्पूर्ण विश्व के केन्द्र हैं। अर्जुन ने यह भी सोचा कि यह उचित ही है कि समस्त सिद्ध जीव तथा सभी शक्तिशाली देवता उन्हें अपना सादर नमस्कार अर्पित करें, क्योंकि उनसे बढ़कर कोई नहीं है। वे विशेष रूप से उल्लेख करते हैं कि श्रीकृष्ण ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि ब्रह्मा की रचना उन्हीं के द्वारा हुई है। ब्रह्मा गर्भोदकशायी विष्णु के नाभि-उदर से उगे कमल-नाल से जन्म लेते हैं, जो श्रीकृष्ण का पूर्ण विस्तार हैं; अतः ब्रह्मा तथा ब्रह्मा से जन्मे भगवान् शिव और अन्य सभी देवताओं को अपना सादर नमस्कार अर्पित करना चाहिए। इस प्रकार भगवान् को भगवान् शिव, ब्रह्मा तथा इसी प्रकार के अन्य देवता सम्मान देते हैं। अक्षरम् शब्द अत्यन्त सार्थक है, क्योंकि यह भौतिक सृष्टि विनाश के अधीन है, किन्तु भगवान् इस भौतिक सृष्टि से ऊपर हैं। वे समस्त कारणों के कारण हैं, और ऐसा होने से वे इस भौतिक प्रकृति के भीतर समस्त बद्ध आत्माओं से तथा स्वयं भौतिक विश्व-प्रकटीकरण से भी श्रेष्ठ हैं। इसीलिए वे सर्व-महान् परमेश्वर हैं।