अध्याय 11 · 36 / 52
11.38
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥
tvam—आप; ādi-devaḥ—आदि परम भगवान्; puruṣaḥ—पुरुष; purāṇaḥ—पुरातन; tvam—आप; asya—इस; viśvasya—विश्व के; param—दिव्य; nidhānam—आश्रय; vettā—ज्ञाता; asi—आप हैं; vedyam ca—तथा ज्ञेय; param ca—तथा दिव्य; dhāma—आश्रय; tvayā—आपके द्वारा; tatam—व्याप्त; viśvam—विश्व; ananta-rūpa—असीम रूप।
आप ही आदि पुरुष, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। आप ही इस प्रकट विश्व-जगत् के एकमात्र आश्रय हैं। आप सब कुछ जानते हैं, और जो कुछ भी ज्ञेय है वह आप ही हैं। आप भौतिक गुणों से परे हैं। हे असीम रूप! यह समस्त विश्व-प्रकटीकरण आपसे ही व्याप्त है!
समस्त वस्तुएँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् पर ही टिकी हैं; अतः वे ही परम विश्राम-स्थल हैं। निधानम् का अर्थ है कि सब कुछ, यहाँ तक कि ब्रह्म-तेज भी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण पर ही टिका है। इस जगत् में जो कुछ घटित हो रहा है उसके वे ज्ञाता हैं, और यदि ज्ञान का कोई अन्त हो, तो वे ही समस्त ज्ञान के अन्त हैं; इस प्रकार वे ही ज्ञात तथा ज्ञेय हैं। वे ज्ञान के विषय हैं, क्योंकि वे सर्वव्यापी हैं। चूँकि वे आध्यात्मिक जगत् में कारण हैं, अतः वे दिव्य हैं। वे दिव्य जगत् में भी प्रमुख पुरुष हैं।