अध्याय 11 · 37 / 52
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वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥
vāyuḥ—वायु; yamaḥ—नियन्ता; agniḥ—अग्नि; varuṇaḥ—जल; śaśāṅkaḥ—चन्द्रमा; prajāpatiḥ—ब्रह्मा; tvam—आप; prapitāmahaḥ—प्रपितामह; ca—भी; namaḥ—नमस्कार अर्पित करते हुए; namaḥ te—पुनः मैं आपको नमस्कार करता हूँ; astu—हो; sahasra-kṛtvaḥ—सहस्र बार; punaḥ ca—तथा पुनः; bhūyaḥ—फिर; api—भी; namaḥ—मैं नमस्कार करता हूँ; namaḥ te—आपको नमस्कार अर्पित करते हुए।
आप ही वायु, अग्नि, जल हैं, और आप ही चन्द्रमा हैं! आप ही परम नियन्ता तथा प्रपितामह हैं। इस प्रकार मैं आपको सहस्र बार, और बारम्बार सादर नमस्कार अर्पित करता हूँ!
यहाँ भगवान् को वायु कहकर सम्बोधित किया गया है, क्योंकि वायु समस्त देवताओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है। अर्जुन श्रीकृष्ण को प्रपितामह कहकर भी सम्बोधित करते हैं, क्योंकि वे विश्व के प्रथम जीव ब्रह्मा के पिता हैं।