अध्याय 11 · 39 / 52
11.41-42
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
sakhā—सखा; iti—इस प्रकार; matvā—सोचकर; prasabham—क्षणिक; yat—जो कुछ; uktam—कहा; he kṛṣṇa—हे कृष्ण; he yādava—हे यादव; he sakhā iti—हे मेरे प्रिय सखा; ajānatā—बिना जाने; mahimānam—महिमा; tava—आपकी; idam—यह; mayā—मेरे द्वारा; pramādāt—मूर्खतावश; praṇayena—प्रेमवश; vā api—अथवा; yat—जो कुछ; ca—भी; avahāsārtham—परिहास के लिए; asatkṛtaḥ—अनादर; asi—किया गया; vihāra—विश्राम में; śayyā—परिहास में; āsana—विश्राम-स्थान में; bhojaneṣu—अथवा साथ भोजन करते समय; ekaḥ—अकेले; athavā—अथवा; api—अन्यों के समक्ष; acyuta—हे अच्युत; tat-samakṣam—आपके प्रतिद्वन्द्वी के रूप में; tat—वह सब; kṣāmaye—क्षमा करें; tvām—आप; aham—मैं; aprameyam—अप्रमेय।
मैंने भूतकाल में आपकी महिमा को बिना जाने आपको “हे कृष्ण,” “हे यादव,” “हे मेरे सखा,” कहकर सम्बोधित किया है। मैंने उन्माद में अथवा प्रेम में जो कुछ किया हो, कृपया उसे क्षमा कर दें। मैंने विश्राम करते समय, अथवा एक ही शय्या पर लेटते समय, या साथ भोजन करते समय—कभी अकेले तथा कभी अनेक सखाओं के समक्ष—आपका अनेक बार अनादर किया है। कृपया मेरे समस्त अपराधों के लिए मुझे क्षमा कर दें।
यद्यपि श्रीकृष्ण अर्जुन के समक्ष अपने विश्वरूप में प्रकट हुए हैं, तथापि अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ अपने सख्य-सम्बन्ध का स्मरण करते हैं और अतः क्षमा माँग रहे हैं तथा उनसे प्रार्थना कर रहे हैं कि वे उन अनेक अनौपचारिक भावभंगिमाओं के लिए, जो सख्य-भाव से उत्पन्न हुईं, उन्हें क्षमा कर दें। वे यह स्वीकार कर रहे हैं कि पहले उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि श्रीकृष्ण ऐसा विश्वरूप धारण कर सकते हैं, यद्यपि उन्होंने अपने अन्तरंग सखा के रूप में इसकी व्याख्या की थी। अर्जुन को यह ज्ञात नहीं था कि उन्होंने श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य को स्वीकार किए बिना, उन्हें “हे मेरे सखा, हे कृष्ण, हे यादव,” इत्यादि कहकर सम्बोधित करते हुए, कितनी बार उनका अनादर किया होगा। किन्तु श्रीकृष्ण इतने दयालु तथा कृपालु हैं कि ऐसे ऐश्वर्य के होते हुए भी उन्होंने अर्जुन के साथ एक सखा की भाँति खेल किया। भक्त तथा भगवान् के बीच दिव्य प्रेम का ऐसा ही आदान-प्रदान होता है। जीव तथा श्रीकृष्ण के बीच का सम्बन्ध नित्य रूप से स्थिर है; जैसा कि अर्जुन के आचरण से हम देख सकते हैं, उसे विस्मृत नहीं किया जा सकता। यद्यपि अर्जुन ने विश्वरूप में ऐश्वर्य देख लिया, तथापि वे श्रीकृष्ण के साथ अपने सख्य-सम्बन्ध को विस्मृत न कर सके।