हि

अध्याय 11 · 40 / 52

11.43

पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥

pitā—पिता; asi—आप हैं; lokasya—समस्त जगत् के; cara—चर; acarasya—अचर; tvam—आप हैं; asya—इसके; pūjyaḥ—आराध्य; ca—भी; guruḥ—गुरु; garīyān—गौरवशाली; na—कभी नहीं; tvat-samaḥ—आपके समान; asti—है; abhyadhikaḥ—श्रेष्ठतर; kutaḥ—यह कैसे सम्भव है; anyaḥ—अन्य; loka-traye—तीनों लोकों में; api—भी; apratima—अप्रमेय; prabhāva—शक्ति।

आप ही इस सम्पूर्ण विश्व-प्रकटीकरण के पिता हैं, आराध्य प्रमुख हैं, आध्यात्मिक गुरु हैं। आपके समान कोई नहीं है, और न ही कोई आपके साथ एक हो सकता है। तीनों लोकों के भीतर आप अप्रमेय हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण उसी प्रकार आराध्य हैं जिस प्रकार पिता अपने पुत्र के लिए आराध्य होता है। वे आध्यात्मिक गुरु हैं, क्योंकि उन्होंने मूल रूप से ब्रह्मा को वैदिक उपदेश दिया, और इस समय वे अर्जुन को भगवद्गीता का भी उपदेश दे रहे हैं; अतः वे ही आदि आध्यात्मिक गुरु हैं, और इस समय किसी भी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को श्रीकृष्ण से उत्पन्न गुरु-परम्परा की श्रृंखला में वंशज होना चाहिए। श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि हुए बिना कोई भी दिव्य विषय का शिक्षक अथवा आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता।

भगवान् को सभी प्रकार से नमस्कार अर्पित किया जा रहा है। वे अप्रमेय महिमा वाले हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से कोई भी बढ़कर नहीं हो सकता, क्योंकि किसी भी प्रकटीकरण में—आध्यात्मिक हो या भौतिक—कोई भी श्रीकृष्ण के समान अथवा उनसे उच्चतर नहीं है। प्रत्येक उनसे नीचे है। कोई भी उनसे आगे नहीं निकल सकता।

परमेश्वर श्रीकृष्ण की इन्द्रियाँ तथा शरीर साधारण मनुष्य के समान हैं, किन्तु उनके लिए उनकी इन्द्रियों, शरीर, मन तथा स्वयं के बीच कोई भेद नहीं है। जो मूर्ख व्यक्ति उन्हें भली-भाँति नहीं जानते, वे कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपनी आत्मा, मन, हृदय तथा अन्य सब वस्तुओं से भिन्न हैं। श्रीकृष्ण परम हैं; अतः उनकी क्रियाएँ तथा शक्तियाँ परम हैं। यह भी कहा गया है कि उनकी इन्द्रियाँ हमारी इन्द्रियों के समान नहीं हैं। वे समस्त इन्द्रिय-क्रियाएँ कर सकते हैं; अतः उनकी इन्द्रियाँ न तो अपूर्ण हैं और न ही सीमित। कोई भी उनसे बढ़कर नहीं हो सकता, कोई भी उनके समान नहीं हो सकता, और प्रत्येक उनसे नीचे है।

जो कोई उनके दिव्य शरीर, क्रियाओं तथा पूर्णता को जान लेता है, वह अपने शरीर त्यागने के पश्चात् उनके पास लौट जाता है और इस दुःखमय जगत् में पुनः नहीं आता। अतः मनुष्य को यह जानना चाहिए कि श्रीकृष्ण की क्रियाएँ अन्यों से भिन्न हैं। सर्वोत्तम नीति यही है कि श्रीकृष्ण के सिद्धान्तों का अनुसरण किया जाए; इससे मनुष्य पूर्ण बन जाएगा। यह भी कहा गया है कि कोई भी ऐसा नहीं है जो श्रीकृष्ण का स्वामी हो; प्रत्येक उनका सेवक है। केवल श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं, और प्रत्येक सेवक है। प्रत्येक उनके आदेश का पालन कर रहा है। ऐसा कोई नहीं है जो उनके आदेश को अस्वीकार कर सके। प्रत्येक उनके निर्देशानुसार, उनके अधीक्षण में रहकर कार्य कर रहा है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, वे ही समस्त कारणों के कारण हैं।