अध्याय 11 · 42 / 52
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अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥
adṛṣṭa-pūrvam—जो पहले कभी न देखा गया हो; hṛṣitaḥ—हर्षित; asmi—मैं हूँ; dṛṣṭvā—देखकर; bhayena—भय से; ca—भी; pravyathitam—विचलित; manaḥ—मन; me—मेरा; tat—अतः; eva—निश्चय ही; me—मुझे; darśaya—दिखाइए; deva—हे प्रभु; rūpam—वह रूप; prasīda—कृपा करें; deveśa—हे देवेश; jagat-nivāsa—विश्व के आश्रय।
इस विश्वरूप को देखकर, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा, मैं हर्षित हूँ, किन्तु साथ ही मेरा मन भय से विचलित है। अतः कृपया मुझ पर अपना अनुग्रह करें और पुनः अपना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वाला रूप प्रकट करें, हे देवेश, हे विश्व के धाम।
अर्जुन सदा श्रीकृष्ण के विश्वास में रहते हैं, क्योंकि वे उनके अत्यन्त प्रिय सखा हैं, और जिस प्रकार एक प्रिय सखा अपने सखा के ऐश्वर्य से हर्षित होता है, उसी प्रकार अर्जुन यह देखकर अत्यन्त प्रसन्न हैं कि उनके सखा श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और ऐसा अद्भुत विश्वरूप दिखा सकते हैं। किन्तु साथ ही, उस विश्वरूप को देखने के पश्चात्, उन्हें भय है कि उन्होंने अपने अनन्य सख्य-भाव से श्रीकृष्ण के प्रति इतने अपराध कर डाले हैं। इस प्रकार उनका मन भय से विचलित है, यद्यपि उन्हें भयभीत होने का कोई कारण नहीं था। अतः अर्जुन श्रीकृष्ण से अपना नारायण-रूप दिखाने को कह रहे हैं, क्योंकि वे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं। यह विश्वरूप भौतिक तथा क्षणिक है, जैसे भौतिक जगत् क्षणिक है। किन्तु वैकुण्ठ लोकों में उनका नारायण के रूप में चतुर्भुज दिव्य रूप है। आध्यात्मिक आकाश में असंख्य लोक हैं, और उनमें से प्रत्येक में श्रीकृष्ण भिन्न-भिन्न नामों वाले अपने पूर्ण प्रकटीकरणों द्वारा विद्यमान हैं। इस प्रकार अर्जुन ने वैकुण्ठ लोकों में प्रकट रूपों में से एक को देखने की इच्छा की। निस्सन्देह प्रत्येक वैकुण्ठ लोक में नारायण का रूप चतुर्भुज है, और चारों हाथ भिन्न-भिन्न चिह्न धारण करते हैं—शंख, गदा, कमल तथा चक्र। इन चारों वस्तुओं को किन-किन हाथों में धारण किया जाता है, उसके अनुसार नारायणों के नाम पड़ते हैं। ये समस्त रूप श्रीकृष्ण के लिए एक ही हैं; अतः अर्जुन उनके चतुर्भुज स्वरूप को देखने की प्रार्थना करते हैं।