हि

अध्याय 11 · 43 / 52

11.46

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥

kirīṭinam—मुकुट सहित; gadinam—गदा सहित; cakra-hastam—हाथ में चक्र; icchāmi—मैं चाहता हूँ; tvām—आपको; draṣṭum—देखना; aham—मैं; tathā eva—उसी स्थिति में; tena eva—उसी; rūpeṇa—रूप से; catur-bhujena—चतुर्भुज; sahasra-bāho—हे सहस्रबाहु; bhava—बन जाइए; viśva-mūrte—हे विश्वरूप।

हे विश्व के स्वामी, मैं आपको आपके चतुर्भुज रूप में देखना चाहता हूँ, जिसमें मुकुट-मण्डित मस्तक हो तथा आपके हाथों में गदा, चक्र, शंख और कमल-पुष्प हों। मैं आपको उसी रूप में देखने को लालायित हूँ।

ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि भगवान् नित्य रूप से सैकड़ों-हज़ारों रूपों में स्थित हैं, और प्रमुख रूप वे हैं जैसे राम, नृसिंह, नारायण, इत्यादि। असंख्य रूप हैं। किन्तु अर्जुन जानते थे कि श्रीकृष्ण ही आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जिन्होंने अपना क्षणिक विश्वरूप धारण किया है। वे अब नारायण के रूप को, जो एक आध्यात्मिक रूप है, देखने को कह रहे हैं। यह श्लोक श्रीमद्भागवत के इस कथन को बिना किसी सन्देह के स्थापित करता है कि श्रीकृष्ण ही आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और अन्य समस्त स्वरूप उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। वे अपने पूर्ण विस्तारों से भिन्न नहीं हैं, और वे अपने असंख्य रूपों में से किसी भी रूप में भगवान् हैं। इन समस्त रूपों में वे एक युवक की भाँति नित्य नवीन हैं। यही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का शाश्वत लक्षण है। जो श्रीकृष्ण को जान लेता है, वह तत्क्षण भौतिक जगत् के समस्त कल्मष से मुक्त हो जाता है।