हि

अध्याय 11 · 44 / 52

11.47

श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥

śrī bhagavān uvāca—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; mayā—मेरे द्वारा; prasannena—प्रसन्नतापूर्वक; tava—तुम्हें; arjuna—हे अर्जुन; idam—यह; rūpam—रूप; param—दिव्य; darśitam—दिखाया गया; ātma-yogāt—अपनी अन्तरंगा शक्ति से; tejomayam—तेज से परिपूर्ण; viśvam—समस्त विश्व; anantam—असीम; ādyam—आदि; yat me—जो मेरा है; tvat-anyena—तुम्हारे अतिरिक्त; na dṛṣṭa-pūrvam—पहले किसी ने नहीं देखा।

श्रीभगवान् ने कहा: हे प्रिय अर्जुन, मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें अपनी अन्तरंगा शक्ति से भौतिक जगत् के भीतर यह विश्वरूप दिखाता हूँ। तुमसे पूर्व किसी ने भी इस असीम तथा प्रचण्ड तेजोमय रूप को कभी नहीं देखा।

अर्जुन परमेश्वर का विश्वरूप देखना चाहते थे, अतः अपने भक्त अर्जुन पर अपनी कृपा से भगवान् श्रीकृष्ण ने अपना तेज तथा ऐश्वर्य से परिपूर्ण विश्वरूप दिखाया। यह रूप सूर्य के समान देदीप्यमान था, और इसके अनेक मुख तीव्रता से बदल रहे थे। श्रीकृष्ण ने यह रूप केवल अपने सखा अर्जुन की इच्छा को सन्तुष्ट करने हेतु दिखाया। यह रूप श्रीकृष्ण ने अपनी अन्तरंगा शक्ति से प्रकट किया, जो मानवीय कल्पना के लिए अचिन्त्य है। अर्जुन से पूर्व भगवान् का यह विश्वरूप किसी ने नहीं देखा था, किन्तु चूँकि यह रूप अर्जुन को दिखाया गया, अतः स्वर्गलोक तथा बाह्य अन्तरिक्ष के अन्य लोकों के अन्य भक्त भी इसे देख सके। उन्होंने इसे पहले नहीं देखा था, किन्तु अर्जुन के कारण वे भी इसे देख सके। दूसरे शब्दों में, भगवान् के समस्त गुरु-परम्परावर्ती भक्त उस विश्वरूप को देख सके जो श्रीकृष्ण की कृपा से अर्जुन को दिखाया गया। किसी ने यह टिप्पणी की कि यह रूप दुर्योधन को भी तब दिखाया गया था जब श्रीकृष्ण शान्ति-वार्ता हेतु दुर्योधन के पास गए थे। दुर्भाग्यवश दुर्योधन ने शान्ति-प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, किन्तु उस समय श्रीकृष्ण ने अपने कुछ विश्वरूप प्रकट किए। किन्तु वे रूप अर्जुन को दिखाए गए इस रूप से भिन्न हैं। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस रूप को पहले किसी ने कभी नहीं देखा।