अध्याय 11 · 45 / 52
11.48
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
na—कभी नहीं; veda—वैदिक अध्ययन; yajña—यज्ञ; adhyayanaiḥ—अध्ययन से; na dānaiḥ—दान से; na—कभी नहीं; ca—भी; kriyābhiḥ—पुण्य कर्मों से; na tapobhiḥ—गम्भीर तपस्याओं से; ugraiḥ—कठोर; evam—इस प्रकार; rūpaḥ—रूप; śakyaḥ—देखा जा सकता है; aham—मैं; nṛloke—इस भौतिक जगत् में; draṣṭum—देखना; tvat—तुम्हारे; anyena—अन्य के द्वारा; kuru-pravīra—हे कुरुवीरों में श्रेष्ठ।
हे कुरुवीरों में श्रेष्ठ, तुमसे पूर्व किसी ने भी मेरे इस विश्वरूप को कभी नहीं देखा, क्योंकि न तो वेदों के अध्ययन से, न यज्ञ करने से, न दान अथवा इसी प्रकार की क्रियाओं से यह रूप देखा जा सकता है। केवल तुमने ही इसे देखा है।
इस सन्दर्भ में दिव्य दृष्टि को भली-भाँति समझ लेना चाहिए। दिव्य दृष्टि किसे प्राप्त हो सकती है? दिव्य का अर्थ है ईश्वरीय। जब तक कोई देवता के समान दिव्यता की स्थिति प्राप्त नहीं करता, तब तक उसे दिव्य दृष्टि नहीं हो सकती। और देवता क्या है? वैदिक शास्त्रों में कहा गया है कि जो भगवान् विष्णु के भक्त हैं, वे ही देवता हैं। जो नास्तिक हैं, अर्थात् जो विष्णु में विश्वास नहीं करते, अथवा जो केवल श्रीकृष्ण के निराकार अंश को ही परम मानते हैं, उन्हें दिव्य दृष्टि नहीं हो सकती। श्रीकृष्ण की निन्दा करते हुए साथ ही दिव्य दृष्टि प्राप्त करना सम्भव नहीं है। दिव्य हुए बिना मनुष्य को दिव्य दृष्टि नहीं हो सकती। दूसरे शब्दों में, जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, वे भी अर्जुन की भाँति देख सकते हैं।
भगवद्गीता विश्वरूप का वर्णन देती है, और यह वर्णन अर्जुन से पूर्व सभी के लिए अज्ञात था। अब इस घटना के पश्चात् मनुष्य को विश्वरूप का कुछ बोध हो सकता है; जो वस्तुतः दिव्य हैं, वे ही भगवान् का विश्वरूप देख सकते हैं। किन्तु श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त हुए बिना कोई दिव्य नहीं हो सकता। तथापि जो भक्त वस्तुतः दिव्य प्रकृति में स्थित हैं और जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, वे भगवान् का विश्वरूप देखने में अधिक रुचि नहीं रखते। जैसा कि पूर्ववर्ती श्लोक में वर्णित है, अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण का विष्णु के रूप में चतुर्भुज रूप देखना चाहते थे, और वे वस्तुतः विश्वरूप से भयभीत थे।
इस श्लोक में कुछ सार्थक शब्द हैं, जैसे वेद-यज्ञाध्ययनैः, जो वैदिक साहित्य के अध्ययन तथा यज्ञ-सम्बन्धी विधियों के विषय को सूचित करता है। वेद समस्त प्रकार के वैदिक साहित्य को सूचित करता है, अर्थात् चार वेद (ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व) तथा अठारह पुराण और उपनिषद्, और वेदान्त-सूत्र। मनुष्य इनका अध्ययन घर पर अथवा कहीं भी कर सकता है। इसी प्रकार, यज्ञ की विधि के अध्ययन हेतु सूत्र, कल्प-सूत्र तथा मीमांसा-सूत्र हैं। दानैः उस दान को सूचित करता है जो किसी उपयुक्त पात्र को अर्पित किया जाता है, जैसे वे जो भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न हैं, अर्थात् ब्राह्मण तथा वैष्णवगण। इसी प्रकार, पुण्य कर्म अग्नि-होत्र इत्यादि को, अर्थात् विभिन्न वर्णों के विहित कर्तव्यों को सूचित करते हैं। पुण्य कर्म तथा कुछ शारीरिक कष्टों के स्वैच्छिक स्वीकार को तपस्या कहा जाता है। अतः मनुष्य ये सब कर सकता है, शारीरिक तप स्वीकार कर सकता है, दान दे सकता है, वेदों का अध्ययन कर सकता है, इत्यादि, किन्तु जब तक वह अर्जुन के समान भक्त न हो, तब तक उस विश्वरूप को देखना सम्भव नहीं है। जो निर्विशेषवादी हैं, वे भी कल्पना करते हैं कि वे भगवान् का विश्वरूप देख रहे हैं, किन्तु भगवद्गीता से हम समझते हैं कि निर्विशेषवादी भक्त नहीं हैं। अतः वे भगवान् का विश्वरूप देखने में असमर्थ हैं।
ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो अवतारों की रचना करते हैं। वे मिथ्या रूप से किसी साधारण मनुष्य को अवतार होने का दावा करते हैं, किन्तु यह सब मूर्खता है। हमें भगवद्गीता के सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए, अन्यथा पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की कोई सम्भावना नहीं है। यद्यपि भगवद्गीता ईश्वर-विज्ञान का प्रारम्भिक अध्ययन मानी जाती है, तथापि वह इतनी पूर्ण है कि मनुष्य यह विवेक कर सकता है कि क्या है क्या। किसी कूट अवतार के अनुयायी कह सकते हैं कि उन्होंने भी ईश्वर के दिव्य अवतार को, विश्वरूप को, देखा है, किन्तु यह स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जब तक कोई श्रीकृष्ण का भक्त न बने, तब तक वह ईश्वर का विश्वरूप नहीं देख सकता। अतः मनुष्य को सर्वप्रथम श्रीकृष्ण का शुद्ध भक्त बनना होता है; तभी वह दावा कर सकता है कि वह जो विश्वरूप उसने देखा है उसे दिखा सकता है। श्रीकृष्ण का भक्त कूट अवतारों अथवा कूट अवतारों के अनुयायियों को स्वीकार नहीं कर सकता।