अध्याय 11 · 46 / 52
11.49
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
mā—ऐसा न हो; te—तुम्हें; vyathā—कष्ट; mā—ऐसा न हो; ca—भी; vimūḍha-bhāvaḥ—मोह; dṛṣṭvā—देखकर; rūpam—रूप; ghoram—भयानक; īdṛk—ऐसा; mama—मेरा; idam—जैसा है; vyapetabhīḥ—समस्त भय से मुक्त हो जाओ; prīta-manāḥ—मन में प्रसन्न; punaḥ—पुनः; tvam—तुम; tat—वह; eva—इस प्रकार; me—मेरा; rūpam—रूप; idam—यह; prapaśya—देखो।
मेरे इस भयानक स्वरूप को देखकर तुम्हारा मन विचलित हो उठा है। अब इसे समाप्त होने दो। हे मेरे भक्त, समस्त विक्षोभ से मुक्त हो जाओ। शान्त मन से अब तुम वह रूप देख सकते हो जिसकी तुम इच्छा करते हो।
भगवद्गीता के आरम्भ में अर्जुन अपने आराध्य पितामहों तथा गुरुओं भीष्म और द्रोण को मारने के विषय में चिन्तित थे। किन्तु श्रीकृष्ण ने कहा कि उन्हें अपने पितामह को मारने से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। जब सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया गया, तब भीष्म तथा द्रोण मौन रहे, और कर्तव्य की ऐसी उपेक्षा के कारण उन्हें मारा जाना चाहिए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप केवल यह दिखाने हेतु दिखाया कि ये लोग अपने अधर्म-कृत्य के कारण पहले ही मारे जा चुके हैं। वह दृश्य अर्जुन को इसलिए दिखाया गया, क्योंकि भक्त सदा शान्त रहते हैं, और वे ऐसे भयानक कृत्य नहीं कर सकते। विश्वरूप के प्राकट्य का प्रयोजन दिखा दिया गया; अब अर्जुन चतुर्भुज रूप देखना चाहते थे, और श्रीकृष्ण ने उन्हें दिखाया। भक्त विश्वरूप में अधिक रुचि नहीं रखता, क्योंकि वह प्रेमपूर्ण भावों के आदान-प्रदान में सहायक नहीं होता। भक्त अपने सादर आराधना-भाव अर्पित करना चाहता है; अतः वह द्विभुज अथवा चतुर्भुज श्रीकृष्ण-रूप देखना चाहता है, जिससे वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ प्रेममयी सेवा में आदान-प्रदान कर सके।