हि

अध्याय 11 · 6 / 52

11.6

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥

पश्य—देखो; आदित्यान्—अदिति के बारह पुत्रों को; वसून्—आठ वसुओं को; रुद्रान्—रुद्र के ग्यारह रूपों को; अश्विनौ—दोनों अश्विनीकुमारों को; मरुतः—उनचास मरुद्गणों को (वायु के देवता); तथा—भी; बहूनि—अनेक; अदृष्ट—जिन्हें तुमने न सुना है न देखा है; पूर्वाणि—पहले; पश्य—वहाँ देखो; आश्चर्याणि—समस्त आश्चर्यजनक वस्तुएँ; भारत—हे भरतश्रेष्ठ।

हे भरतश्रेष्ठ, यहाँ आदित्यों, रुद्रों तथा समस्त देवताओं के विभिन्न प्रकटीकरणों को देखो। उन अनेक वस्तुओं को निहारो, जिन्हें इससे पूर्व किसी ने न कभी देखा है और न सुना है।

यद्यपि अर्जुन श्रीकृष्ण के व्यक्तिगत मित्र थे और विद्वानों में सर्वाधिक उन्नत थे, तथापि उनके लिए श्रीकृष्ण के विषय में सब कुछ जान पाना सम्भव नहीं था। यहाँ कहा गया है कि मनुष्यों ने इन समस्त रूपों तथा प्रकटीकरणों के विषय में न तो सुना है और न जाना है। अब श्रीकृष्ण इन आश्चर्यजनक रूपों को प्रकट करते हैं।