अध्याय 11 · 7 / 52
11.7
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
इह—इसमें; एकस्थम्—एक स्थान में; जगत्—ब्रह्माण्ड; कृत्स्नम्—पूर्णतया; पश्य—देखो; अद्य—तुरन्त; स—सहित; चर—चर; अचरम्—अचर; मम—मेरे; देहे—इस शरीर में; गुडाकेश—हे अर्जुन; यत्—जो; च—भी; अन्यत्—अन्य; द्रष्टुम्—देखने के लिए; इच्छसि—तुम चाहो।
जो कुछ तुम देखना चाहते हो, उसे इस शरीर में एक ही साथ देखा जा सकता है। यह विश्वरूप तुम्हें वह सब कुछ दिखला सकता है, जिसकी तुम अब इच्छा करते हो और साथ ही जिसकी तुम भविष्य में इच्छा करोगे। यहाँ सब कुछ पूर्णतया विद्यमान है।
कोई भी मनुष्य एक स्थान पर बैठकर समस्त ब्रह्माण्ड को नहीं देख सकता। बड़े-से-बड़ा वैज्ञानिक भी यह नहीं देख सकता कि ब्रह्माण्ड के अन्य भागों में क्या हो रहा है। श्रीकृष्ण उसे वह सब कुछ देखने की शक्ति प्रदान करते हैं, जिसे वह देखना चाहता है—भूत, वर्तमान तथा भविष्य। इस प्रकार श्रीकृष्ण की कृपा से अर्जुन सब कुछ देख पाने में समर्थ होते हैं।