अध्याय 12 · 1 / 16
12.1
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; एवम्—इस प्रकार; सतत—सदा; युक्ताः—संलग्न; ये—जो; भक्ताः—भक्तगण; त्वाम्—आपकी; पर्युपासते—भली-भाँति आराधना करते हैं; ये—जो; च—भी; अपि—पुनः; अक्षरम्—इन्द्रियातीत; अव्यक्तम्—अव्यक्त; तेषाम्—उनमें से; के—कौन; योग-वित्तमाः—सर्वाधिक पूर्ण।
अर्जुन ने पूछा: इन दोनों में अधिक पूर्ण कौन माना जाता है—वे जो आपकी भक्ति में भली-भाँति संलग्न रहते हैं, अथवा वे जो निराकार ब्रह्म की, उस अव्यक्त की, आराधना करते हैं?
श्रीकृष्ण ने अब साकार, निराकार तथा विराट का वर्णन किया है, और सब प्रकार के भक्तों एवं योगियों का भी वर्णन किया है। सामान्यतया दिव्यवादियों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। एक निर्विशेषवादी है, और दूसरा साकारवादी। साकारवादी भक्त अपनी समस्त शक्ति से परमेश्वर की सेवा में प्रवृत्त रहता है। निर्विशेषवादी श्रीकृष्ण की सेवा में प्रत्यक्षतः संलग्न न होकर निराकार ब्रह्म, उस अव्यक्त, के ध्यान में प्रवृत्त रहता है।
इस अध्याय में हम पाते हैं कि परम सत्य की अनुभूति की भिन्न-भिन्न विधियों में भक्तियोग, अर्थात् भगवद्भक्ति, सर्वोच्च है। यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करना चाहता है, तो उसे भक्ति का आश्रय अवश्य लेना चाहिए।
जो परमेश्वर की प्रत्यक्ष रूप से भक्ति द्वारा आराधना करते हैं, वे साकारवादी कहलाते हैं। जो निराकार ब्रह्म के ध्यान में स्वयं को संलग्न करते हैं, वे निर्विशेषवादी कहलाते हैं। यहाँ अर्जुन यह प्रश्न कर रहे हैं कि कौन-सी स्थिति श्रेष्ठतर है। परम सत्य की अनुभूति के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं, किन्तु श्रीकृष्ण इस अध्याय में संकेत करते हैं कि भक्तियोग, अर्थात् उनकी भक्ति, सबमें सर्वोच्च है। यह सर्वाधिक प्रत्यक्ष है, और भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करने का सबसे सुगम साधन है।
द्वितीय अध्याय में भगवान् बताते हैं कि जीव भौतिक शरीर नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक स्फुलिंग है, परम सत्य का एक अंश है। सप्तम अध्याय में वे जीव को परम पूर्ण के अंश के रूप में बताते हैं और अनुशंसा करते हैं कि वह अपना समग्र ध्यान उस पूर्ण की ओर स्थानान्तरित कर ले। अष्टम अध्याय में यह कहा गया है कि जो भी मृत्यु के क्षण में श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, वह तत्क्षण आध्यात्मिक आकाश को, श्रीकृष्ण के धाम को, स्थानान्तरित कर दिया जाता है। और षष्ठ अध्याय के अन्त में भगवान् कहते हैं कि समस्त योगियों में जो अपने अन्तर में श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, वह सर्वाधिक पूर्ण माना जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण के प्रति साकार भक्ति को आध्यात्मिक अनुभूति का सर्वोच्च रूप बताया गया है। तथापि कुछ ऐसे भी हैं जो अब भी श्रीकृष्ण की निराकार ब्रह्मज्योति आभा की ओर आकृष्ट होते हैं, जो परम सत्य का सर्वव्यापी पक्ष है तथा जो अव्यक्त एवं इन्द्रियों की पहुँच से परे है। अर्जुन यह जानना चाहते हैं कि इन दोनों प्रकार के दिव्यवादियों में कौन ज्ञान में अधिक पूर्ण है। दूसरे शब्दों में, वे अपनी ही स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के साकार रूप के प्रति आसक्त हैं। वे निराकार ब्रह्म के प्रति आसक्त नहीं हैं। वे जानना चाहते हैं कि उनकी स्थिति सुरक्षित है या नहीं। निराकार अभिव्यक्ति, चाहे इस भौतिक जगत् में हो या परमेश्वर के आध्यात्मिक जगत् में, ध्यान हेतु एक समस्या है। वस्तुतः कोई भी परम सत्य के निराकार पक्ष की पूर्णतः कल्पना नहीं कर सकता। अतएव अर्जुन कहना चाहते हैं, “ऐसी समय की हानि से क्या लाभ?” अर्जुन ने एकादश अध्याय में अनुभव किया कि श्रीकृष्ण के साकार रूप के प्रति आसक्त रहना श्रेष्ठ है, क्योंकि इस प्रकार वे एक ही समय में अन्य सभी रूपों को समझ सके और श्रीकृष्ण के प्रति उनके प्रेम में कोई बाधा न पड़ी। अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण से पूछा गया यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न परम सत्य की निराकार एवं साकार धारणाओं के बीच के भेद को स्पष्ट करेगा।