अध्याय 12 · 2 / 16
12.2
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥
श्रीभगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; मयि—मुझमें; आवेश्य—स्थिर करके; मनः—मन; ये—जो; माम्—मेरी; नित्य—सदा; युक्ताः—संलग्न; उपासते—आराधना करते हैं; श्रद्धया—श्रद्धा सहित; परया—दिव्य; उपेताः—संलग्न होते हैं; ते—वे; मे—मेरे; युक्ततमाः—सर्वाधिक पूर्ण; मताः—मैं मानता हूँ।
श्रीभगवान् ने कहा: जिसका मन मेरे साकार रूप में स्थिर रहता है और जो महान् एवं दिव्य श्रद्धा सहित सदा मेरी आराधना में संलग्न रहता है, वह मेरे द्वारा सर्वाधिक पूर्ण माना जाता है।
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जो उनके साकार रूप में अपना ध्यान केन्द्रित करता है और जो श्रद्धा एवं भक्ति सहित उनकी आराधना करता है, वह योग में सर्वाधिक पूर्ण माना जाना चाहिए। ऐसी कृष्णभावनामृत में स्थित मनुष्य के लिए कोई भौतिक क्रियाएँ नहीं रहतीं, क्योंकि सब कुछ श्रीकृष्ण के लिए ही किया जाता है। शुद्ध भक्त निरन्तर संलग्न रहता है—कभी वह जप करता है, कभी श्रीकृष्ण के विषय में सुनता या ग्रन्थ पढ़ता है, कभी प्रसाद पकाता है या श्रीकृष्ण के लिए कुछ क्रय करने हेतु बाज़ार जाता है, कभी मन्दिर या बर्तन धोता है—वह जो भी करे, एक भी क्षण ऐसा नहीं जाने देता जो उसने अपनी क्रियाओं को श्रीकृष्ण को अर्पित किए बिना बीता दिया हो। ऐसी क्रिया पूर्ण समाधि में होती है।