हि

अध्याय 12 · 7 / 16

12.9

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥ ९ ॥

अथ—यदि, अतएव; चित्तम्—मन; समाधातुम्—स्थिर करने में; न—नहीं; शक्नोषि—समर्थ; मयि—मुझमें; स्थिरम्—स्थिर; अभ्यास—अभ्यास; योगेन—भक्ति द्वारा; ततः—अतएव; माम्—मुझे; इच्छा—इच्छा; आप्तुम्—प्राप्त करने की; धनञ्जय—हे अर्जुन।

हे प्रिय अर्जुन! हे धनञ्जय! यदि तुम अपना मन अविचलित रूप से मुझमें स्थिर नहीं कर सकते, तो भक्तियोग के नियमित सिद्धान्तों का अनुसरण करो। इस प्रकार तुम्हारे भीतर मुझे प्राप्त करने की इच्छा विकसित होगी।

इस श्लोक में भक्तियोग की दो भिन्न विधियाँ इंगित की गई हैं। प्रथम विधि उस मनुष्य पर लागू होती है जिसने दिव्य प्रेम द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति वास्तव में आसक्ति विकसित कर ली है। और दूसरी विधि उस मनुष्य के लिए है जिसने दिव्य प्रेम द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम के प्रति आसक्ति विकसित नहीं की है। इस दूसरे वर्ग के लिए भिन्न-भिन्न विहित नियम एवं विधियाँ हैं, जिनका अनुसरण करके मनुष्य अन्ततः श्रीकृष्ण के प्रति आसक्ति के स्तर तक उन्नत हो सकता है।

भक्तियोग इन्द्रियों की शुद्धि है। इस समय भौतिक अस्तित्व में इन्द्रियाँ सदा अशुद्ध रहती हैं, क्योंकि वे इन्द्रियतृप्ति में संलग्न रहती हैं। किन्तु भक्तियोग के अभ्यास से ये इन्द्रियाँ शुद्ध हो सकती हैं, और शुद्ध अवस्था में वे प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर के सम्पर्क में आती हैं। इस भौतिक अस्तित्व में मैं किसी स्वामी की किसी सेवा में संलग्न हो सकता हूँ, किन्तु मैं वास्तव में अपने स्वामी की प्रेमपूर्वक सेवा नहीं करता। मैं केवल कुछ धन प्राप्त करने हेतु सेवा करता हूँ। और स्वामी भी प्रेम में नहीं रहता; वह मुझसे सेवा लेता है और मुझे धन देता है। अतः वहाँ प्रेम का कोई प्रश्न नहीं है। किन्तु आध्यात्मिक जीवन के लिए मनुष्य को प्रेम की शुद्ध अवस्था तक उन्नत होना ही चाहिए। प्रेम की वह अवस्था वर्तमान इन्द्रियों से सम्पन्न भक्ति के अभ्यास द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

ईश्वर के प्रति यह प्रेम इस समय प्रत्येक के हृदय में सुप्त अवस्था में है। और वहाँ ईश्वर का प्रेम भिन्न-भिन्न रीतियों से प्रकट होता है, किन्तु यह भौतिक संग के कारण दूषित रहता है। अब इस भौतिक संग को शुद्ध करना है, और श्रीकृष्ण के प्रति उस सुप्त, स्वाभाविक प्रेम को पुनर्जागृत करना है। यही समूची विधि है।

भक्तियोग के नियमित सिद्धान्तों का अभ्यास करने के लिए मनुष्य को, किसी निपुण आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में, कुछ सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए: मनुष्य को प्रातःकाल जल्दी उठना चाहिए, स्नान करना चाहिए, मन्दिर में प्रवेश करके प्रार्थना अर्पित करनी चाहिए और हरे कृष्ण का जप करना चाहिए, फिर अर्चाविग्रह को अर्पित करने हेतु पुष्प एकत्र करने चाहिए, अर्चाविग्रह को अर्पित करने हेतु भोज्य पदार्थ पकाने चाहिए, प्रसाद ग्रहण करना चाहिए, इत्यादि। विविध नियम एवं विधियाँ हैं, जिनका मनुष्य को अनुसरण करना चाहिए। और मनुष्य को शुद्ध भक्तों से निरन्तर भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवत का श्रवण करना चाहिए। यह अभ्यास किसी को भी ईश्वर के प्रेम के स्तर तक उठने में सहायता कर सकता है, और तब वह ईश्वर के आध्यात्मिक राज्य में अपनी प्रगति के विषय में निश्चिन्त हो जाता है। नियमों एवं विधियों के अन्तर्गत, आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में भक्तियोग का यह अभ्यास निश्चय ही मनुष्य को ईश्वर के प्रेम के स्तर तक ले आएगा।