अध्याय 12 · 12 / 16
12.15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
यस्मात्—जिससे; न—कभी नहीं; उद्विजते—विचलित होते हैं; लोकः—लोग; लोकात्—लोगों से; न—कभी नहीं; उद्विजते—विचलित होता है; च—भी; यः—जो कोई; हर्ष—सुख; अमर्ष—दुःख; भय—भय; उद्वेगैः—चिन्ता से; मुक्तः—मुक्त; यः—जो; सः—वह; च—भी; मे—मुझे; प्रियः—अत्यन्त प्रिय।
जिससे कोई कठिनाई में नहीं पड़ता और जो चिन्ता से विचलित नहीं होता, जो सुख एवं दुःख में स्थिर रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।
भक्त के कुछ और गुणों का वर्णन किया जा रहा है। ऐसे भक्त के कारण कोई भी कठिनाई, चिन्ता, भय अथवा असन्तोष में नहीं पड़ता। चूँकि भक्त सबके प्रति दयालु है, अतः वह इस प्रकार आचरण नहीं करता जिससे दूसरे चिन्ता में पड़ें। साथ ही, यदि दूसरे भक्त को चिन्ता में डालने का प्रयत्न करें, तो वह विचलित नहीं होता। यह भगवान् की कृपा से ही है कि वह इतना अभ्यस्त है कि किसी बाह्य उद्वेग से विचलित नहीं होता। वस्तुतः चूँकि भक्त सदा कृष्णभावनामृत में निमग्न तथा भक्ति में संलग्न रहता है, अतः ऐसी समस्त भौतिक परिस्थितियाँ उसे लुभा नहीं सकतीं। सामान्यतया भौतिकतावादी व्यक्ति तब अत्यन्त प्रसन्न होता है जब उसकी इन्द्रियतृप्ति एवं उसके शरीर हेतु कुछ होता है, किन्तु जब वह देखता है कि अन्यों के पास उनकी इन्द्रियतृप्ति हेतु कुछ है और उसके पास नहीं, तब वह दुःखी एवं द्वेषयुक्त हो जाता है। जब वह किसी शत्रु से प्रतिशोध की अपेक्षा करता है, तब वह भय की अवस्था में रहता है, और जब वह किसी कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं कर पाता, तब वह खिन्न हो जाता है। किन्तु भक्त इन समस्त उद्वेगों से सदा दिव्य रहता है; अतएव वह श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है।